उत्तरप्रदेश

उत्तर प्रदेश सरकार और प्रयागराज विकास प्राधिकरण को फटकार लगाई सुप्रीम कोर्ट ने

सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को सख्त निर्देश दिया कि वो सभी पांच याचिकाकर्ताओं को 6 हफ्तों के भीतर 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दे

AINS NEWS… साल 2021 में प्रयागराज में उत्तर प्रदेश सरकार और प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने एक बुलडोजर कार्रवाई को अंजाम दिया। इस कार्रवाई में पांच लोगों के घरों को ध्वस्त कर दिया गया। इनमें वकील जुल्फिकार हैदर, प्रोफेसर अली अहमद फातमी, दो महिलाएं और एक अन्य व्यक्ति शामिल थे। सरकार का दावा था कि ये जमीन माफिया और गैंगस्टर अतीक अहमद से जुड़ी थी, जिसकी हत्या साल 2023 में हो चुकी है। लेकिन पीड़ितों का कहना था कि उनकी संपत्ति का अतीक से कोई लेना-देना नहीं था और ये कार्रवाई पूरी तरह से गैरकानूनी थी।

इन लोगों का आरोप था कि प्रशासन ने शनिवार की रात को नोटिस जारी किया और अगले ही दिन, यानी रविवार को बुलडोजर लेकर उनके घरों को ढहा दिया। उन्हें न तो अपनी बात रखने का मौका दिया गया, न ही अपील करने का समय। ये कार्रवाई इतनी तेजी से हुई कि पीड़ित परिवार कुछ समझ पाते, उससे पहले ही उनके घर मलबे में तब्दील हो चुके थे। इसके बाद, पीड़ितों ने इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां उनकी याचिका खारिज हो गई। फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली

24 मार्च 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने इस मामले की सुनवाई शुरू की। कोर्ट ने जैसे ही इस कार्रवाई का ब्योरा सुना, उसकी प्रतिक्रिया बेहद सख्त थी। जस्टिस ओका ने कहा, “यह हमारी अंतरात्मा को झकझोरता है कि किस तरह से आवासीय परिसरों को मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया गया।” कोर्ट ने नोटिस देने के सिर्फ 24 घंटे बाद घरों को गिराने पर कड़ा ऐतराज जताया। पीठ ने सवाल उठाया कि आखिर पीड़ितों को अपनी सफाई पेश करने या अपील करने का समय क्यों नहीं दिया गया?

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि देश में कानून का शासन है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है। जस्टिस ओका ने जोर देकर कहा, “अगर हम एक मामले में ऐसी प्रक्रिया को बर्दाश्त कर लेंगे, तो ये सिलसिला चलता रहेगा।” कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा कि आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों की गई और कानूनी प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं हुआ? इस सुनवाई में सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी कि नोटिस पहले भी कई बार दिए गए थे और ये कार्रवाई अवैध कब्जे को हटाने के लिए थी। लेकिन कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की भारी कमी थी।

1 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुनाया। इस फैसले में कोर्ट ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार और प्रयागराज विकास प्राधिकरण को फटकार लगाई, बल्कि पीड़ितों को बड़ी राहत भी दी। कोर्ट ने कहा कि ये पूरी कार्रवाई “असंवैधानिक” थी और इसमें कानून की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। जस्टिस ओका ने अपने फैसले में कहा, “आश्रय का अधिकार मौलिक है। देश में कानून का शासन है और नागरिकों के घरों को इस तरह से नहीं गिराया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रयागराज विकास प्राधिकरण को सख्त निर्देश दिया कि वो सभी पांच याचिकाकर्ताओं को 6 हफ्तों के भीतर 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दे। साथ ही, कोर्ट ने ये भी साफ किया कि नोटिस देने के 24 घंटे के भीतर घर गिराना पूरी तरह से गैरकानूनी था। इस फैसले को सुनते ही पूरे देश में चर्चा शुरू हो गई। विपक्षी दलों ने इसे योगी सरकार के खिलाफ एक बड़ा झटका बताया, तो कई लोगों ने इसे कानून के शासन की जीत करार दिया।

पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में बुलडोजर का इस्तेमाल अपराधियों और अवैध निर्माणों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर किया जाता रहा है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई बार इस नीति पर सवाल उठाए हैं। नवंबर 2024 में कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई के लिए देशव्यापी दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि किसी भी ध्वस्तीकरण से पहले नोटिस देना, सुनवाई का मौका देना और वीडियोग्राफी करना जरूरी है।

प्रयागराज का ये मामला उस नीति की एक मिसाल है, जहां इन नियमों का पालन नहीं हुआ। कोर्ट ने साफ कर दिया कि सिर्फ किसी के अपराधी होने या संदेह के आधार पर उसके घर को नहीं ढहाया जा सकता। इससे उत्तर प्रदेश सरकार की उस छवि पर भी असर पड़ा, जो बुलडोजर को “न्याय का प्रतीक” बताती रही है। इस फैसले के बाद कई लोग ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या अब बुलडोजर कार्रवाई पर पूरी तरह से रोक लग जाएगी? जवाब शायद नहीं है, लेकिन अब हर कार्रवाई में कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी होगा।

इस फैसले से जुल्फिकार हैदर, अली अहमद और बाकी पीड़ितों को न सिर्फ मुआवजा मिलेगा, बल्कि उनके सम्मान और अधिकारों की भी रक्षा हुई है। कोर्ट ने ये भी संकेत दिया कि अगर भविष्य में ऐसी कार्रवाइयां हुईं, तो जिम्मेदार अधिकारियों को सजा भुगतनी पड़ सकती है। ये फैसला उन तमाम लोगों के लिए उम्मीद की किरण है, जो अपने घरों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।

हालांकि, सरकार के लिए ये एक सबक है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। अगर प्रशासन को लगता है कि कोई निर्माण अवैध है, तो उसे पहले नोटिस देना होगा, सुनवाई करनी होगी और फिर फैसला लेना होगा। बुलडोजर को हथियार की तरह इस्तेमाल करना अब इतना आसान नहीं होगा।

 

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