गरियाबंद

ग्रामीण की सतर्कता से बची संकटग्रस्त गिद्ध की जान, 25 दिन बाद जंगल में भरी उड़ान

भोजन, गतिविधि, सजगता और शारीरिक स्थिति की लगातार निगरानी की गई

AINS NEWS गरियाबंद… धवलपुर रेंज के घटौद बांध के पास पानी में संघर्ष कर रहे एक संकटग्रस्त लॉन्ग-बिल्ड वल्चर को ग्रामीण की तत्परता से नई जिंदगी मिली। ग्रामीण रामदयाल नेताम ने 30 जुलाई को गिद्ध को संकट में देखा और तत्काल वन विभाग को सूचना दी। सूचना मिलते ही वन अमला मौके पर पहुंचा और पक्षी का सुरक्षित रेस्क्यू किया।

रेस्क्यू के बाद गिद्ध को वन शिविर लाकर उसके भीगे पंख सुखाए गए और भोजन व सुरक्षित आश्रय दिया गया। इसके बाद उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के अधिकारियों और पशु चिकित्सक डॉ. राकेश वर्मा ने उसका स्वास्थ्य परीक्षण किया। पक्षी को आगे के उपचार और व्यवस्थित पुनर्वास के लिए रिजर्व की देखरेख में रखा गया।

गिद्ध की करीब 25 दिनों तक जिदार वन चौकी में विशेष देखभाल की गई। वन रक्षक ओम प्रकाश राव की निगरानी में उसे प्रतिदिन लगभग 700 ग्राम स्वस्थ मटन, पर्याप्त पानी, निर्धारित सप्लीमेंट और दवाएं दी गईं। उसके भोजन, गतिविधि, सजगता और शारीरिक स्थिति की लगातार निगरानी की गई।

वैज्ञानिक पहचान के लिए गिद्ध को बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) की ओर से उपलब्ध कराई गई रिंग पहनाई गई, जिस पर E-12 कोड अंकित है। GPS/GSM टैगिंग की संभावना पर भी विचार किया गया था, लेकिन निर्धारित अवधि में उपकरण उपलब्ध नहीं हो सका।

लगभग 25 दिनों के पुनर्वास के बाद 25 अगस्त 2026 को चोकसिल हिल्स, दक्षिण उदंती रेंज में गिद्ध को उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया। रिहाई के समय उसका वजन 4.23 किलोग्राम था और उम्र करीब 6 माह आंकी गई। रिंग लगाए जाने के बाद गिद्ध ने सफलतापूर्वक उड़ान भरी और जंगल में लौट गया।

वन विभाग के अनुसार यह सफलता किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि ग्रामीणों, वन अमले, पशु चिकित्सकों, वन्यजीव विशेषज्ञों और तकनीकी टीम के सामूहिक प्रयास का परिणाम है। यह घटना बताती है कि जागरूक ग्रामीण वन्यजीव संरक्षण की पहली कड़ी बन सकते हैं।

लॉन्ग-बिल्ड वल्चर एक अति संकटग्रस्त प्रजाति है और पारिस्थितिकी तंत्र में प्राकृतिक सफाईकर्मी की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मृत पशुओं के अवशेषों को हटाने और पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखने में गिद्धों का अहम योगदान होता है। ऐसे में एक गिद्ध का सफल पुनर्वास इस संकटग्रस्त प्रजाति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

 

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