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Varalakshmi Vrat Katha: इस कथा के बिना अधूरा होगा वरलक्ष्मी व्रत, जानें पूजा की सही विधि

Varalakshmi Vrat 2023 Katha: दक्षिण भारत में सावन माह के आखिरी शुक्रवार के दिन बड़ी ही धूम-धाम से वरलक्ष्मी व्रत का त्योहार मनाया जाता है। ये दिन मां लक्ष्मी के वरलक्ष्मी स्वरुप को सपर्पित है।

इस दिन सुहागिन महिलाएं पूजा-पाठ के साथ ही व्रत रखती हैं और मां वरलक्ष्मी से अपने पति की लंबी उम्र और घर में खुशहाली की कामना करती हैं। इस दिन विधिनुसार पूजा करने के साथ ही व्रत कथा पढ़ने का भी विधान है। कहते हैं जब तक ये कथा न पढ़ी जाएं तब तक आपकी पूजा पूरी नहीं मानी जाती है। आइए जानते हैं क्या है पूजा विधि और व्रत कथा?

स्टोरी में आगे ये पढ़ें….

  • वरलक्ष्मी पूजा व्रत शुभ मुहू्र्त?
  • वरलक्ष्मी पूजा की सही विधि?
  • वरलक्ष्मी पूजा व्रत कथा?

वरलक्ष्मी पूजा व्रत शुभ मुहू्र्त?

वरलक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त 25 अगस्त की सुबह 5 बजकर 55 मिनट से शुरू होगा जो सुबह 7 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। अगर आप इस मुहूर्त में पूजा न कर पाएं तो दोपहर 12 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 16 मिनट तक अभिजित मुहूर्त रहेगा जिसे शुभ मुहूर्त माना जाता है।

वरलक्ष्मी पूजा की सही विधि?

  • वरलक्ष्मी व्रत के दिन सुबह जल्दी नहा-धोकर साफ कपड़े पहनें।
  • इसके बाद घर में बने मंदिर को गंगाजल से शुद्ध करें।
  • फिर एक चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और मां लक्ष्मी व भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित करें।
  • फिर हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प करें और पूजन शुरू करें।
  • भगवान की मूर्ति के दाएं तरफ थोड़े से चावल रखें और उस पर जल से भरा कलश रखें।
  • इसके बाद कलश पर कलावा बांधें और स्वास्तिक बनाएं।
  • फिर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश को सिंदूर का तिलक लगाएं, फूल माला अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।
  • मां वरलक्ष्मी को सुहाग के सामान अर्पित करें और भोग लगाएं।
  • फिर वरलक्ष्मी व्रत कथा पढ़ें और आरती करें।
  • पूजा पूरी होने के बाद प्रसाद को घर के सदस्यों में बांट दें।

वरलक्ष्मी पूजा व्रत कथा?

एक समय की बात है चारुमती नाम की महिला हुआ करती थी, जो मां लक्ष्मी की बहुत बड़ी भक्त थी। वह हर शुक्रवार के दिन लक्ष्मी माता की विधि-पूर्वक पूजा करती थी। एक रात उसके सपने में स्वयं माता लक्ष्मी ने उसे वरलक्ष्मी व्रत के बारे में बताया था। इस सपने के बाद से ही चारुमती ने इस व्रत को रखना शुरू किया।

चारुमती ने अपनी सखी-सहेलियों को भी पावन व्रत के बारे में बताया। जिसके बाद चारूमती की सभी सहेलियों ने विधि-विधान कलश स्थापना की और उसकी पूजा कर परिक्रमा लगाई। कहा जाता है कि इस व्रत के फलस्वरूप उन सभी महिलाओं को मनचाहा वरदान म‍िला। किसी महिला को धन, किसी को संतान की प्राप्ति हुई। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक तभी से इस व्रत का परंपरा चली आ रही है।

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