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ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026, ट्रांसजेंडर समुदाय के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन

13 मार्च को मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार द्वारा ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक, 2026 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया

AINS NEWS… सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार के राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद की सदस्य के रूप में नामित विद्या राजपूत ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस विषय से सीधे जुड़े राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद के सदस्यों से किसी प्रकार का पूर्व परामर्श नहीं किया गया। जब हमने इस विधेयक का अध्ययन किया, तो यह स्पष्ट हुआ कि यह ट्रांसजेंडर समुदाय के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन करता है।

1. पहचान और परिभाषा का सीमितकरण

इस विधेयक में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को अत्यंत सीमित कर दिया गया है, जिसमें केवल किन्नर, हिजड़ा, जोगप्पा, अरावनी और इंटरसेक्स व्यक्तियों को शामिल किया गया है।
ट्रांसपुरुष, ट्रांसमहिला और जेंडर क्वीर व्यक्तियों को इसमें शामिल नहीं किया गया है — जो पूरी तरह गलत और असंवैधानिक है।

यह सीधे तौर पर NALSA v. Union of India के ऐतिहासिक निर्णय का उल्लंघन है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि:

प्रत्येक व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार है

यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के अंतर्गत संरक्षित है

नया विधेयक इस Self-identification (स्व-पहचान) के अधिकार को समाप्त करता है और इसे केवल जैविक या सामाजिक श्रेणियों तक सीमित कर देता है।

2. मेडिकल बोर्ड और शारीरिक परीक्षण का मुद्दा

विधेयक में ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की व्यवस्था का प्रावधान किया गया है।
हम स्पष्ट रूप से कहना चाहते हैं:

ट्रांसजेंडर पहचान मनोवैज्ञानिक (psychological) होती है, न कि केवल शारीरिक

किसी भी व्यक्ति को अपनी पहचान सिद्ध करने के लिए कपड़े उतारकर शारीरिक परीक्षण कराना पड़े — यह उसकी गरिमा (dignity) के विरुद्ध है

यदि सरकार मेडिकल बोर्ड बनाना चाहती है, तो उसमें मनोवैज्ञानिक (psychologist) काउंसलर को शामिल किया जाना चाहिए, और प्रक्रिया संवाद आधारित होनी चाहिए — निर्णय का अंतिम अधिकार व्यक्ति का ही होना चाहिए।

3. धारा 18 – यौन अपराधों में भेदभावपूर्ण सजा

इस विधेयक की धारा 18 के अनुसार:

ट्रांसजेंडर व्यक्ति के साथ यौन अपराध करने पर सजा: 6 माह से 2 वर्ष

जबकि महिलाओं के लिए भारतीय दंड संहिता में कहीं अधिक कठोर सजा का प्रावधान है।

यह सवाल उठता है:

क्या हम भारत के नागरिक नहीं हैं?

क्या हम इंसान नहीं हैं?

यह प्रावधान समानता के अधिकार (Article 14) का स्पष्ट उल्लंघन है।

4. जेंडर अफर्मेशन सर्जरी पर नियंत्रण

विधेयक के अनुसार:

सर्जरी के लिए मेडिकल बोर्ड की अनुमति

जिला मजिस्ट्रेट को सूचना देना अनिवार्य

यह पूरी तरह अनुचित है।

अन्य किसी भी चिकित्सा प्रक्रिया के लिए लोगों को DM को सूचना नहीं देनी पड़ती

एक वयस्क व्यक्ति को अपने शरीर पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार है

यह प्रावधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Article 21) का उल्लंघन करता है।

5. सरकार की मूल समझ में समस्या

इस पूरे विधेयक से यह स्पष्ट होता है कि सरकार ट्रांसजेंडर को केवल जैविक विकृति (biological condition) के रूप में देख रही है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों (WPATH Guidelines) के अनुसार ट्रांसजेंडर पहचान एक जेंडर आइडेंटिटी और मनोवैज्ञानिक अनुभव है

6. परामर्श की कमी और जल्दबाजी

राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर परिषद से कोई चर्चा नहीं

एक दिन में लोकसभा और अगले दिन राज्यसभा में पारित

यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।

7. वास्तविक मुद्दों की अनदेखी

ट्रांसजेंडर समुदाय को सबसे अधिक जरूरत है:

स्वास्थ्य सेवाएं

आरक्षण

शिक्षा

रोजगार

सामाजिक सुरक्षा

लेकिन इस विधेयक में इन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

निष्कर्ष

यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय को सशक्त करने के बजाय उन्हें नियंत्रित, सीमित और अपराधीकरण करने का प्रयास करता है

हम सरकार से मांग करते हैं:

1. इस विधेयक को तुरंत वापस लिया जाए

2. ट्रांसजेंडर समुदाय और राष्ट्रीय परिषद से व्यापक परामर्श किया जाए

3. NALSA जजमेंट और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप नया विधेयक तैयार किया जाए

 

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