एनएच-130सी के किनारे चार एकड़ कृषि भूमि पर अवैध प्लॉटिंग की तैयारी, लगभग 20 प्लॉट के सौदे की चर्चा
तार फेंसिंग कर किया जा रहा सीमांकन, भू-उपयोग परिवर्तन और ले-आउट स्वीकृति के बिना बिक्री के आरोप, प्रशासनिक जांच की मांग

AINS NEWS /JEEVAN S. SAHU/ गरियाबंद… जिला मुख्यालय में एनएच-130सी से लगी करीब चार एकड़ कृषि भूमि पर बिना विधिवत भू-उपयोग परिवर्तन और बिना नगर एवं ग्राम निवेश विभाग की अनुमति के आवासीय प्लॉटिंग किए जाने की तैयारी का मामला सामने आया है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, संबंधित भूमि के चारों ओर तार फेंसिंग कर प्लॉटों का सीमांकन किया जा रहा है। करीब 15 से 20 प्लॉटों के सौदे होने और उनकी एक साथ रजिस्ट्री कराने की तैयारी की भी चर्चा है। हालांकि, इन दावों और स्वीकृतियों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

बताया जा रहा है कि खसरा नंबर 273/1 मजरकट्ट, 287/2, 286, 959, 288, 287/1 मजरकट्ट, 285/1, 295 और 285/2 की भूमि पर प्लॉटिंग की तैयारी चल रही है। आरोप है कि प्रस्तावित कॉलोनी के लिए नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से ले-आउट स्वीकृत नहीं कराया गया है। मौके पर सड़क, नाली, जल निकासी, बिजली, खुली भूमि और अन्य बुनियादी सुविधाओं की भी कोई स्पष्ट योजना दिखाई नहीं दे रही है। इसके बावजूद कृषि भूमि को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर बेचने की तैयारी की जा रही है।
यदि बिना आवश्यक अनुमति और भू-उपयोग परिवर्तन के कृषि भूमि की प्लॉटिंग और बिक्री की जाती है, तो शासन को डायवर्सन शुल्क सहित अन्य वैधानिक मदों में राजस्व का नुकसान हो सकता है। वहीं, भविष्य में प्लॉट खरीदने वालों को रास्ते, निर्माण अनुमति, बिजली-पानी कनेक्शन और नामांतरण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

इस मामले में स्थानीय स्तर पर पटवारी और तहसीलदार की भूमिका भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। सूत्रों का कहना है कि संबंधित भूमि की वास्तविक स्थिति, खसरा रिकॉर्ड, सीमांकन और प्रस्तावित बिक्री की जानकारी राजस्व अमले से छिपी नहीं हो सकती। इसके बावजूद मौके पर चल रही गतिविधियों पर अब तक कोई प्रभावी रोक नहीं लगाई गई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
रजिस्ट्री कार्यालय की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि प्रस्तावित प्लॉटों की रजिस्ट्री के लिए आवश्यक भू-उपयोग परिवर्तन, स्वीकृत ले-आउट, पहुंच मार्ग और अन्य अनिवार्य दस्तावेजों की पर्याप्त जांच किए बिना पंजीयन प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कुछ रजिस्ट्रियां बिना स्पष्ट दिशा-निर्देश और पूर्ण दस्तावेजों के कराने की तैयारी में हैं। हालांकि, रजिस्ट्री विभाग के अधिकारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही इन आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
ग्रामीणों और स्थानीय नागरिकों के बीच कथित रूप से जमीन मालिकों, बिचौलियों और कुछ संबंधित कर्मचारियों के बीच सांठगांठ की भी चर्चा है। स्थानीय लोग इसे “मलाई-मिठाई” के खेल से जोड़कर देख रहे हैं। नागरिकों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत से अवैध प्लॉटिंग को संरक्षण तो नहीं मिल रहा।
जानकारों के अनुसार, कृषि भूमि को आवासीय उपयोग में लाने के लिए भू-उपयोग परिवर्तन, डायवर्सन, नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से ले-आउट स्वीकृति, सड़क और नाली की व्यवस्था, सार्वजनिक उपयोग के लिए खुली भूमि तथा अन्य आवश्यक अनुमतियां लेना अनिवार्य है। इन प्रक्रियाओं का पालन किए बिना प्लॉट काटकर बिक्री करने से खरीदारों के अधिकार और भविष्य की निर्माण गतिविधियां प्रभावित हो सकती हैं।

विशेषज्ञों ने संभावित खरीदारों को सलाह दी है कि रजिस्ट्री से पहले भूमि का रिकॉर्ड, भू-उपयोग, डायवर्सन आदेश, स्वीकृत ले-आउट, पहुंच मार्ग, बंधक स्थिति और न्यायालयीन विवाद की जानकारी अवश्य जांचें। केवल रजिस्ट्री हो जाने से भूमि का उपयोग स्वतः वैध नहीं हो जाता। बाद में प्रशासनिक कार्रवाई होने पर खरीदारों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला मुख्यालय और मुख्य मार्ग के किनारे इतने बड़े स्तर पर चल रही गतिविधि पर अब तक राजस्व विभाग, नगर पंचायत, पंजीयन विभाग तथा नगर एवं ग्राम निवेश विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ी? क्या संबंधित अधिकारियों ने मौके का निरीक्षण किया है? क्या भूमि का डायवर्सन हुआ है? क्या ले-आउट स्वीकृत है? क्या प्रस्तावित प्लॉटों के लिए वैध पहुंच मार्ग और मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था है? इन सभी सवालों का जवाब प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
स्थानीय लोगों ने संबंधित खसरा नंबरों की तत्काल जांच, मौके का सीमांकन, खरीदी-बिक्री और रजिस्ट्री पर निगरानी तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की है। नागरिकों ने पटवारी, तहसीलदार, पंजीयन कार्यालय और नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के रिकॉर्ड की संयुक्त जांच कराने की भी मांग की है। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही, मिलीभगत या अवैध वसूली सामने आती है तो उसके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

इस संबंध में शिकायत सीधे मुख्यमंत्री, राज्यपाल और गरियाबंद कलेक्टर से करने की तैयारी की जा रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि शिकायत के माध्यम से संबंधित खसरा नंबरों की जांच, मौके का निरीक्षण, प्रस्तावित रजिस्ट्रियों पर रोक और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी।
फिलहाल पूरे मामले में प्रशासनिक जांच का इंतजार है। आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन कृषि भूमि पर तार फेंसिंग कर प्लॉटों का सीमांकन किए जाने और कथित रूप से सौदे होने की चर्चा से मामला गंभीर बन गया है। अब देखना होगा कि जिला प्रशासन कितनी जल्दी कार्रवाई करता है और क्या प्रस्तावित रजिस्ट्रियों पर रोक लगाकर भूमि की वास्तविक स्थिति की जांच कराई जाती है।
जीवन एस. साहू की कलम से….




