राहुल गांधी के लोकसभा सदस्यता खोने के पीछे क्या कोई राजनीति हैं या यह महज एक कानूनी कार्यवाई हैं, पढ़े पूरी खबर….
राहुल गांधी से पहले इन विधायकों और सांसदों की भी जा चुकी है सदस्यता

AINS NEWS… राहुल गांधी के गिरफ्तारी के पीछे क्या नरेन्द्र मोदी का हाथ हैं या स्वयं राहुल गांधी, आइये हम इसको सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं.

पढ़े पूरी खबर….
2019 – में राहुल गांधी ने कर्नाटक में एक सभा के दौरान मोदी सरनेम को लेकर एक बयान दिया था. उन्होंने कहा था, ‘सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों होता है?’. हालांकि सजा के तुरंत बाद उन्हें 15 हजार के मुचलके पर जमानत दे दी गई. बता दें कि इस मामले में राहुल गांधी पर पिछले 4 साल से मानहानि का मामला चल रहा था.
मालूम हो कि 2019 में लोकसभा चुनाव के प्रचार को दौरान कर्नाटक में राहुल गांधी ने विवादित बयान दिया था. एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कथित तौर पर कहा था, ‘सभी चोरों के सरनेम मोदी क्यों है.’ इस बयान के बाद पूरे देश में सियासी बवंडर आ गया था. फिर बीजेपी विधायक पूर्णेश मोदी ने राहुल गांधी पर मानहानि का केस ठोका था.उन्होंने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने अपने बयान से पूरे मोदी समाज का अपमान किया है.
मानहानि के इस मामले की सुनवाई के दौरान राहुल गांधी 3 बार अदालत के सामने पेश हुए थे. पहली बार 9 जुलाई 2020 को वह कोर्ट में पेश हुए. इस दौरान मामले की सुनवाई में देरी हुई तो पुर्णेश मोदी ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया था. इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत को इस मामले की सुनवाई में तेजी लाने के निर्देश दिए थे. फिर अक्टूबर 2021 में दोबारा राहुल गांधी कोर्ट के सामने पेश हुए. इस दौरान उन्होंने कुछ को निर्दोष करार दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया था अहम फैसला
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में अपने एक फैसले में कहा था कि अगर कोई सांसद या विधायक निचली अदालत में दोषी करार होता है तो उस तारीख से ही उनकी संसद या विधानसभा की सदस्यता को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा.
इससे पहले कितने नेताओ की लोकसभा सदस्यता रद्द हो चुकी हैं….
- इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी: राहुल गांधी के साथ हुई यह कार्रवाई गांधी परिवार के साथ ऐसा पहला मामला नहीं है. इससे पहले साल 1978 में राहुल की दादी इंदिरा गांधी और साल 2006 में मां सोनिया गांधी भी अपनी सदस्यता गंवा चुकी हैं. हालांकि इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी ने उपचुनाव में जीत हासिल करके सदन में एंट्री ले ली थी.
- लालू प्रसाद यादवः लालू प्रसाद यादव को रांची की एक विशेष अदालत ने 3 अक्टूबर 2013 को चारा घोटाले मामले में दोषी करार दिया था. इसके बाद संसदीय अधिसूचना से उनकी लोकसभा सदस्यता अयोग्य घोषित कर दी गई थी.
- आजम खान: समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान की सदस्यता भी चली गई है. आजम खान रामपुर से लगातार 10 बार विधायक चुने जा चुके हैं और सांसद भी रहे. आजम खान पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अभद्र टिप्पणी का आरोप लगा था. इस मामले में तीन साल तक कोर्ट में केस चला और फिर कोर्ट ने उन्हें तीन साल की सजा सुनाई.
- अब्दुल्ला आजम: आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम की भी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई. मुरादाबाद की एक विशेष अदालत ने 15 साल पुराने मामले में सपा महासचिव आजम खान और उनके विधायक बेटे अब्दुल्ला आजम को दो साल की सजा सुनाई थी.
- विक्रम सैनी: मुजफ्फरनगर की खतौली से विधायक रहे विक्रम सैनी की भी सदस्यता चली गई है. विक्रम दंगे में शामिल होने के दोषी पाए गए थे. ये मामला 2013 का है. तब मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगे हुए थे, उस समय विक्रम सैनी जिला पंचायत सदस्य थे और उनका नाम दंगों में आया था.
- मोहम्मद फैजल: लक्षद्वीप सांसद मोहम्मद फैजल को भी कोर्ट ने 10 साल की सजा सुनाई है. जिसके बाद उनकी सदस्यता चली गई थी. चुनाव आयोग ने लक्षद्वीप लोकसभा पर उपचुनाव कराने के लिए अधिसूचना भी जारी कर दी थी. हालांकि, बाद में केरल हाईकोर्ट ने सजा पर रोक लगा दी है. अभी ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
- कुलदीप सिंह सेंगर: उन्नाव रेप कांड में दोषी ठहराए गए बीजेपी के विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की भी सदस्यता जा चुकी है. कुलदीप सेंगर को रेप मामले में दोषी ठहराया गया था. कोर्ट ने आजीवन करावास की सजा सुनाई गई थी.
- खब्बू तिवारी: भारतीय जनता पार्टी से अयोध्या की गोसाइगंज सीट से विधायक रहे इंद्र प्रताप सिंह उर्फ खब्बू तिवारी की सदस्यता 2021 में चली गई थी. खब्बू तिवारी फर्जी मार्कशीट केस में दोषी पाए गए थे. 18 अक्टूबर 2021 को एमपी-एमएलए कोर्ट द्वारा उन्हें पांच साल की सजा सुनाई थी.
इस मामले में विपक्षी दल और कांग्रेस सभी एक जूट होकर केंद्र सरकार पर हमलावर हो गए हैं, जहां – तहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी का पूतला फूका जा रहां हैं और भाजपा कार्यलय के बाहर भी हंगामा कर रहे हैं.
परन्तु जब पूरी मामला को ध्यान से समझे तो यह मामला तो 2019 का हैं इसमे ऐसा बिलकुल भी प्रतीत नहीं होता हैं की तुरंत प्रभाव से कार्यवाही की गई हो, और यह ऐसा कोई पहली मामला नहीं हैं इससे पहले भी और नेताओ के साथ हो चूका हैं
इस मामले को ध्यान से देखा जाए तो इसमे राहुल गांधी जी की लापरवाही सामने आ रही हैं, पहली तो राहुल गांधी ने भारत के न्यायालय और कानून व्यवस्था को हल्का में ले लिया, दूसरी बात अगर राहुल गांधी ने स्वीकारा होगा हाँ मैंने ऐसा बोला हैं, और राहुल गांधी जो भी बोले हैं वो कानून के नजरो में दंडनात्मक हैं – तभी उनको 2 साल की सजा हुई हैं इसका मतलब उनको अपनी गलती पहले से ही पता था, तो पहले ही कोर्ट के सामने माफी मांग लेते तो शायद आज ये दिन देखने को नहीं मिलती.
और सबसे महत्वपूर्ण पूर्ण बात की राहुल गांधी ने अपने ऊपर हुए केश में उस समय तुरंत संज्ञान नहीं लिया और न ही उनके किसी नेता ने. भारत के लोगो को और सभी राजनेताओ को भारत के न्याय पालिका पर पूरा भरोसा रखना चाहिए. कि कभी, किसी भी मामले को लेकर कोई पक्षपात नहीं करेंगे.




