साहब हमन ल गुरुजी दे दव, बच्चों की कलेक्टर से गुहार, महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने के लिए कोई स्थायी शिक्षक नहीं
लगभग 50 छात्र-छात्राएं अपनी किताबें छोड़कर कलेक्टर ऑफिस पहुँच गए

AINS NEWS… मामला है बलौदा बाज़ार ज़िले के कसडोल विकासखंड के नगर पंचायत टुंड्रा का। यहाँ के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 11वीं और 12वीं के लगभग 400 छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं। ये वो दौर होता है जब एक छात्र अपने करियर की नींव रखता है। कोई डॉक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, कोई अफसर तो कोई टीचर। लेकिन टुंड्रा के इन बच्चों के सपने धुंधले पड़ते जा रहे हैं। क्यों? क्योंकि इनके स्कूल में हिंदी, अंग्रेज़ी, भूगोल, रसायन, सामाजिक विज्ञान, जीव विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र और संस्कृत जैसे 9 बड़े और महत्वपूर्ण विषयों को पढ़ाने के लिए कोई स्थायी शिक्षक ही नहीं है।

प्रदेश सरकार ने ये मानते हुए कि स्कूलों में शिक्षकों की संख्या पर्याप्त है, युक्तियुक्तकरण के नाम पर एक नई व्यवस्था लागू की। इसके तहत जो शिक्षक अस्थायी तौर पर या संलग्नीकरण के तहत दूसरे स्कूलों में पढ़ा रहे थे, उन्हें उनके मूल स्कूलों में वापस भेज दिया गया। कागज़ों पर शायद ये फ़ैसला सही लगा हो, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही निकली।
बलौदा बाज़ार ज़िले में इस फ़ैसले ने शिक्षकों का सरप्लस करने के बजाय, भारी कमी पैदा कर दी। और इसका सबसे बड़ा ख़ामियाज़ा भुगत रहे हैं टुंड्रा के ये 400 छात्र।
जब इन बच्चों की आवाज़ स्कूल और स्थानीय अधिकारियों तक पहुँचकर अनसुनी हो गई, तो इन्होंने एक बड़ा क़दम उठाने का फ़ैसला किया। मंगलवार का दिन था, जब शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय टुंड्रा के लगभग 50 छात्र-छात्राएं अपनी किताबें छोड़कर कलेक्टर ऑफिस पहुँच गए। कलेक्टर जनदर्शन में पहुंचकर इन बच्चों ने एक ही मांग की – “साहब, हमें शिक्षक दे दो!”
ये तस्वीरें हमारे सिस्टम पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं। क्या बच्चों को अपनी पढ़ाई का हक़ मांगने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ेगा? क्या अधिकारियों को समस्या की गंभीरता समझने के लिए बच्चों के प्रदर्शन का इंतज़ार करना पड़ता है?
बच्चों के इस क़दम ने प्रशासन को नींद से जगाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर दीपक सोनी ने बच्चों से मुलाक़ात की और उन्हें आश्वासन दिया कि जल्द ही वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी। कलेक्टर साहब के इस भरोसे के बाद बच्चों ने अपना धरना तो समाप्त कर दिया, लेकिन उनके मन में अब भी एक सवाल है – ये वैकल्पिक व्यवस्था कब तक चलेगी? क्या उन्हें स्थायी शिक्षक मिलेंगे?
ज़िला के शिक्षा अधिकारी ये मान रहे हैं कि ज़िले में शिक्षकों की कमी है। जब अधिकारी ख़ुद इस बात को स्वीकार कर रहे हैं, तो सवाल ये उठता है कि इस कमी को दूर करने के लिए ठोस क़दम क्यों नहीं उठाए जा रहे? युक्तियुक्तकरण जैसी नीतियां बनाने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का आकलन क्यों नहीं किया गया?
ये सिर्फ़ टुंड्रा के एक स्कूल की कहानी नहीं है। ये छत्तीसगढ़ के कई स्कूलों की हक़ीक़त हो सकती है। ये उन 400 बच्चों के भविष्य का सवाल है, जिनके सपनों पर सिस्टम की लापरवाही का ताला लग गया है। इन बच्चों को राजनीति या आंकड़ों से मतलब नहीं है। इन्हें बस अपनी क्लास में एक टीचर चाहिए जो उन्हें पढ़ा सके, उनके सवालों का जवाब दे सके और उन्हें एक बेहतर भविष्य के लिए तैयार कर सके।




