बस्तर में तेजी से विलुप्त हो रहे सल्फी के वृक्ष, नहीं बचा पा रहे ग्रामीण
कृषि वैज्ञानिकों ने शोध कर निकाला समाधान

AINS NEWS जगदलपुर… आदिवासियों का कल्प वृक्ष् कहा जाने वाला सल्फी पेड़ का असि्त्त्व खतरे में है। दरअसल फिजेरियम ऑक्सीएक्सोरम नामक फंगस के कारण सल्फी के पेड़ मर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने शोध कर इसका समाधान निकाला है पर ग्रामीण इसे बचा नहीं पा रहे हैं। सल्फी पेड़ को नहीं बचा पाने का कारण अधिकतर ग्रामीणों को इसके उपाय की जानकारी नहीं है, इसके कारण अब ग्रामीणों का सल्फी के पौधे लगाने में मोह भंग हो गया।

उल्लेखनीय है कि सल्फी के पेड़ों से निकलने वाली रस से ग्रामीणों को अच्छी खासी आमदनी होती थी, लेकिन फंगस ने ग्रामीणों की आय को छिन लिया। करीब दो दशक पहले तक बस्तर के हर गांव में घर की बाड़ियों में बड़ी संख्या में सल्फी के पेड़ नजर आते थे। ग्रामीण सल्फी रस को नशे के रूप में सेवन करते हैं। व एक सल्फी पेड़ से करीब 15 साल बाद रस निकलना शुरू होता है और करीब 25 साल तक जारी रहता है। एक पेड़ से हर साल करीब 25 से 30 हजार रूपए की आमदनी होती है। यही कारण था कि ग्रामीण बच्चों की तरह सल्फी के पौधे का जतन करते थे।
सल्फी के स्थान पर छिंद का रोपण
बस्तर के ग्रामीण अब सल्फी के पौधे के जगह छिंद के पौधे लगा रहे हैं। अब बस्तर में सल्फी के रस के लगह छिंद रस की चलन बढ़ती जा रही है। छिंदपेड़ से ग्रामीण अब सालभर रस निकाल रहे हैं। यही कारण है कि अब ग्रामीण खेतों के मेड़ में हर साल बहुतायत में छिंद के पौधे का रोपण करने लगे हैं।




