गरियाबंद

कुम्हड़ाईखुर्द पंचायत में 15वें वित्त आयोग की राशि में बड़ा खेल, सफाई गांव की, मलाई बेटे की फर्म को! 

सफाई कार्य का पैसा 'कृषि फर्म' के खाते में कैसे हुआ ट्रांसफर? ₹45 हजार के संदिग्ध भुगतान से देवभोग जनपद में मचा हड़कंप, निष्पक्ष जांच की मांग तेज

AINS NEWS/JEEVAN S SAHU/गरियाबंद… पंचायतों के विकास और बुनियादी सुविधाओं के नाम पर आने वाले सार्वजनिक धन पर किस कदर डाका डाला जा रहा है, इसका जीता-जागता प्रमाण गरियाबंद जिले के देवभोग ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत कुम्हड़ाईखुर्द में सामने आया है। केंद्र सरकार के 15वें वित्त आयोग की राशि से गांव की सफाई कराने के नाम पर ₹45,000 का सीधा भुगतान एक निजी कृषि फर्म को कर दिया गया। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस ‘हेमलाल कृषि फर्म’ को यह भुगतान किया गया, उसका संचालन पंचायत से जुड़े एक रसूखदार प्रतिनिधि/पदाधिकारी के सगे बेटे द्वारा किए जाने की प्रबल चर्चा है।

सार्वजनिक सफाई के नाम पर जारी सरकारी बजट को अपनों की झोली में डालने का यह मामला अब केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे-सीधे पद के दुरुपयोग और हितों के गंभीर टकराव का खुला खेल नजर आ रहा है।

सफाई का टेंडर या अपनों को उपकृत करने का जरिया?
ग्राम पंचायत कुम्हड़ाईखुर्द के इस भुगतान ने कई गंभीर तकनीकी और प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं:

*कार्य सफाई का, तो फर्म कृषि की क्यों?* ग्राम पंचायत में झाड़ू लगाने, नालियों की सफाई कराने या कचरा उठाने जैसे श्रम-आधारित कार्यों के लिए किसी ‘कृषि उपकरण/खाद-बीज’ से संबंधित कृषि फर्म को भुगतान किस नियम के तहत किया गया?
क्या कोई प्रस्ताव पारित हुआ था? क्या ग्राम सभा या पंचायत की सामान्य सभा में इस कार्य और भुगतान को लेकर कोई विधिवत प्रस्ताव पास किया गया था? या फिर गुपचुप तरीके से कागजों में खेल रचकर चेक/खाते के जरिए राशि ट्रांसफर कर दी गई? टेंडर प्रक्रिया और कोटेशन का क्या हुआ? क्या इस सफाई कार्य के लिए पंचायत राज अधिनियम और वित्तीय नियमों के तहत न्यूनतम तीन फर्मों से कोटेशन मंगाए गए थे, या सीधे पसंदीदा ‘पारिवारिक फर्म’ को लाभ पहुंचाने के लिए नियम-कायदे ताक पर रख दिए गए?

*कागजों में चमका गांव, धरातल पर गंदगी का अंबार?*

स्थानीय ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों का आरोप है कि यदि रिकॉर्ड में सफाई कार्य दर्ज है, तो प्रशासन इसकी धरातलीय जांच कराए:

आखिर यह सफाई गांव के किस वार्ड, मोहल्ले या सार्वजनिक स्थल पर कराई गई?

कितने दिनों तक सफाई अभियान चला और उसमें कितने मजदूर (श्रमिक) लगाए गए?

मजदूरों का दैनिक मस्टररोल कहां है? उनका भुगतान नकद हुआ या बैंक खाते में?

कार्य पूरा होने के बाद ग्राम पंचायत के सचिव और संबंधित तकनीकी अधिकारी द्वारा क्या कोई स्थलीय सत्यापन किया गया था?
चर्चा है कि मौके पर काम नाममात्र का हुआ या कागजों में ही पूरा कर लिया गया, जबकि रिकॉर्ड दुरुस्त कर पूरी रकम निजी खाते में स्थानांतरित कर दी गई।

*’हितों के टकराव’ की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं?*

पंचायत राज अधिनियम के स्पष्ट प्रावधान हैं कि कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि या पंचायत से जुड़ा जिम्मेदार व्यक्ति अपने परिवार, रक्त-संबंधियों या स्वयं की व्यावसायिक फर्मों को लाभ पहुंचाने वाले किसी भी वित्तीय निर्णय या अनुबंध में शामिल नहीं हो सकता। यदि ‘हेमलाल कृषि फर्म’ वास्तव में पंचायत प्रतिनिधि के पुत्र के नाम पर पंजीकृत है, तो यह सीधा-सीधा भ्रष्टाचार और अधिकार के दुरुपयोग का मामला बनता है।

*जांच के प्रमुख बिंदु जो तुरंत खंगाले जाने चाहिए:*

पंचायत का प्रस्ताव रजिस्टर: क्या कार्य स्वीकृति का वैधानिक प्रस्ताव मौजूद है?

कार्यादेश व बिल-वाउचर: फर्म द्वारा जारी किए गए बिल, जीएसटी/पंजीयन विवरण और सामग्री या कार्य का ब्योरा।

मस्टररोल व श्रमिक विवरण: मौके पर कार्य करने वाले श्रमिकों की सूची और उनकी उपस्थिति।

सत्यापन प्रतिवेदन: किस अधिकारी/कर्मचारी ने कार्य के सही होने का प्रमाण-पत्र दिया।

बैंक स्टेटमेंट: 15वें वित्त आयोग के खाते से सीधे हेमलाल कृषि फर्म के खाते में हुए लेन-देन का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड।

*प्रशासन पर टिकी नजरें:*

क्या होगी कठोर कार्रवाई या दबा दिया जाएगा मामला?
जनता के टैक्स और केंद्र सरकार के 15वें वित्त आयोग का पैसा गांव की तस्वीर बदलने के लिए आता है, न कि पंचायत प्रतिनिधियों के पारिवारिक व्यवसायों को समृद्ध करने के लिए। कुम्हड़ाईखुर्द का यह मामला गरियाबंद जिला प्रशासन और जनपद पंचायत देवभोग के अधिकारियों के लिए एक खुली चुनौती है।

अब देखना यह होगा कि जनपद पंचायत देवभोग के आला अधिकारी इस पूरे मामले में कब तक जांच टीम गठित कर मौके पर भेजते हैं। यदि दस्तावेजों और मौके की स्थिति में अंतर पाया जाता है, तो क्या सिर्फ रिकवरी की रस्म अदायगी होगी या दोषियों पर धारा 40 के तहत पदमुक्ति और वित्तीय धोखाधड़ी की कानूनी एफआईआर दर्ज कराई जाएगी? जब तक जांच निष्पक्ष और सार्वजनिक नहीं होती, तब तक पंचायत में उठे सवालों का धुआं थमता नजर नहीं आ रहा।

 

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