गरियाबंद

उपसरपंच को लाभ पहुंचाने के लिए लाखों का बिल? खोखमा (ध्रुवागुड़ी) पंचायत में वित्तीय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल, सचिव ने मानी गलती

उपसरपंच से लेकर सचिव और तकनीकी अमले तक की भूमिका जांच के घेरे में

AINS NEWS/गरियाबंद/जीवन एस साहू… विकासखंड मैनपुर की ग्राम पंचायत खोखमा (ध्रुवागुड़ी) में पंचायत की वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। पंचायत के निर्वाचित उपसरपंच के नाम पर कथित तौर पर लाखों रुपये का बिल काटे जाने की जानकारी सामने आने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि पंचायत सचिव थानसिंह नायक द्वारा कथित रूप से अपनी गलती स्वीकार किए जाने की बात सामने आई है।

हालांकि, अभी यह जांच का विषय है कि बिल किस कार्य, सामग्री या मद के लिए जारी किया गया, वास्तविक भुगतान हुआ अथवा नहीं, राशि किस खाते में गई और पूरी प्रक्रिया में किन-किन लोगों की भूमिका रही। इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजी एवं विभागीय जांच जरूरी है।

*बिल से बड़ा सवाल—लाभार्थी कौन और प्रक्रिया क्या थी?*

पंचायत में किसी भी सार्वजनिक राशि के व्यय के पीछे स्वीकृति, पंचायत प्रस्ताव, कार्यादेश/अनुमोदन, माप-पुस्तिका जहां लागू हो, बिल-वाउचर, तकनीकी सत्यापन, भुगतान स्वीकृति तथा लेखा अभिलेख जैसी प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण होती हैं।

ऐसे में यदि किसी निर्वाचित उपसरपंच के नाम पर पंचायत की राशि से लाखों रुपये का बिल जारी हुआ है तो सबसे पहला सवाल यही है कि उपसरपंच किस हैसियत से बिल का प्राप्तकर्ता बना और उस भुगतान का वैधानिक आधार क्या था?

क्या वह वास्तव में किसी सामग्री या कार्य का वैध आपूर्तिकर्ता था?
क्या उसके नाम पर पंचायत ने विधिवत कार्य या सामग्री की खरीदी की?
क्या पंचायत का प्रस्ताव मौजूद है?
क्या संबंधित कार्य वास्तव में धरातल पर हुआ?
क्या बिल का तकनीकी सत्यापन हुआ?
क्या भुगतान हो चुका है या केवल बिल तैयार किया गया था?

इन सवालों का जवाब दस्तावेजों की जांच से ही सामने आएगा।

*उपसरपंच की भूमिका भी जांच के केंद्र में क्यों?*

छत्तीसगढ़ पंचायत राज अधिनियम की धारा 48 के तहत सरपंच और उपसरपंच की शक्तियां एवं कार्य राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार निर्धारित होते हैं। 1994 के संबंधित नियमों के नियम 3 के अनुसार उपसरपंच को सामान्य परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से पंचायत निधि संचालन का पृथक अधिकार नहीं दिया गया है; सरपंच की अनुपस्थिति में उसके कार्य एवं शक्तियां उपसरपंच द्वारा निर्वहन किए जाने का प्रावधान है।

यही कारण है कि खोखमा मामले में यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु होगा कि उपसरपंच ने स्वयं कोई वित्तीय भूमिका निभाई थी या नहीं, बिल के निर्माण/प्रस्तुतीकरण में उसकी सहमति या भागीदारी थी या नहीं और भुगतान प्रक्रिया में उसके पक्ष में कोई विशेष लाभ उत्पन्न हुआ या नहीं।

यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी निर्वाचित पदाधिकारी ने अपने पद का उपयोग व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के लिए किया, तो मामला केवल एक बिल की अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पंचायत पद की गरिमा और वित्तीय जवाबदेही का विषय बन सकता है।

*”सचिव की स्वीकारोक्ति ने बढ़ाई जिम्मेदारी की चिंता”*

मामले में पंचायत सचिव थानसिंह नायक द्वारा कथित रूप से गलती स्वीकार किए जाने की बात सामने आने के बाद विभागीय जांच की आवश्यकता और बढ़ गई है।

लेकिन केवल गलती स्वीकार कर लेना पूरे प्रकरण का पटाक्षेप नहीं हो सकता। जांच में यह पता लगाना जरूरी होगा कि—

– बिल किसने तैयार किया?
– बिल किसके निर्देश पर बनाया गया?
– किस मद से राशि प्रस्तावित की गई?
– पंचायत प्रस्ताव में इसका उल्लेख है या नहीं?
– बिल पर किस-किस अधिकारी/पदाधिकारी के हस्ताक्षर हैं?
– भुगतान की अनुमति किसने दी?
– राशि वास्तव में किस खाते में पहुंची?
– भुगतान के पूर्व तकनीकी एवं लेखा परीक्षण हुआ या नहीं?
– संबंधित कार्य/सामग्री की मौके पर उपलब्धता कितनी है?
– पंचायत के कैशबुक, लेजर, वाउचर और बैंक स्टेटमेंट में क्या दर्ज है?

*सचिव अकेला जिम्मेदार या पूरी प्रक्रिया की कड़ी जांच जरूरी?*

मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच केवल पंचायत सचिव तक सीमित करना पर्याप्त नहीं होगा। यदि बिल के आधार पर भुगतान हुआ है तो पूरी वित्तीय श्रृंखला की जांच आवश्यक है।

पंचायत स्तर पर पदाधिकारी, सचिव, संबंधित कर्मचारी तथा जहां तकनीकी परीक्षण/माप/प्रमाणीकरण लागू हो वहां संबंधित तकनीकी अधिकारी अथवा इंजीनियर की भूमिका भी अभिलेखों के आधार पर जांची जानी चाहिए।

हालांकि किसी अधिकारी या इंजीनियर की संलिप्तता मान लेना उचित नहीं होगा। उनकी भूमिका केवल तभी सवालों के घेरे में आएगी जब रिकॉर्ड से यह सामने आए कि उनके स्तर से तकनीकी सत्यापन, माप, प्रमाणन या भुगतान प्रक्रिया में कोई महत्वपूर्ण कार्रवाई हुई थी।

*”धारा 88 के तहत जांच से खुल सकता है पूरा मामला”*

छत्तीसगढ़ पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की धारा 88 राज्य सरकार को पंचायत के मामलों से संबंधित जांच कराने का अधिकार देती है। ऐसे में इस प्रकरण में विस्तृत विभागीय जांच कराकर मूल अभिलेखों का परीक्षण कराया जा सकता है।

जांच में पंचायत प्रस्ताव रजिस्टर, बिल-वाउचर, कैशबुक, लेजर, बैंक स्टेटमेंट, भुगतान आदेश, कार्यादेश, माप पुस्तिका, तकनीकी प्रमाणन, सामग्री प्राप्ति संबंधी दस्तावेज और संबंधित योजना की स्वीकृति सहित सभी रिकॉर्ड की जांच की जानी चाहिए।

*”धारा 89 में नुकसान की भरपाई का भी प्रावधान”*

यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि पंचायत की राशि का नुकसान, अपव्यय या दुरुपयोग किसी पंचायत पदाधिकारी, अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका अथवा लापरवाही से हुआ है, तो अधिनियम की धारा 89 के तहत व्यक्तिगत दायित्व और राशि की वसूली का प्रावधान है। संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने के बाद नुकसान की राशि की वसूली की जा सकती है।

यानी जांच का सवाल सिर्फ यह नहीं कि “बिल गलत था या सही?”, बल्कि यह भी होगा कि “यदि गलत था तो पंचायत को कितना आर्थिक नुकसान हुआ और उसकी जिम्मेदारी किसकी है?”

*”रिकॉर्ड गायब या राशि रोकने की स्थिति में धारा 92 भी महत्वपूर्ण“*

यदि जांच के दौरान पंचायत के रिकॉर्ड, दस्तावेज अथवा राशि किसी व्यक्ति के पास अनधिकृत रूप से पाई जाती है तो अधिनियम की धारा 92 के तहत prescribed authority द्वारा उन्हें वापस लेने की कार्रवाई का प्रावधान है।

इसलिए जांच एजेंसी के लिए पंचायत के मूल दस्तावेजों को तत्काल सुरक्षित कर उनका परीक्षण करना महत्वपूर्ण होगा।

*क्या पंचायत में पारदर्शिता के बजाय ‘अपने लोगों’ को लाभ पहुंचाने की व्यवस्था?*

खोखमा का मामला केवल एक बिल का मामला नहीं माना जा सकता। ग्राम पंचायत में सरकारी राशि जनता के विकास कार्यों के लिए आती है। यदि किसी निर्वाचित पदाधिकारी के नाम पर ऐसे बिल तैयार किए जाते हैं जिनका वैधानिक आधार स्पष्ट नहीं है, तो इससे पंचायत की वित्तीय पारदर्शिता पर स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।

ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत में सड़क, नाली, पेयजल, स्वच्छता, भवन और अन्य विकास कार्यों के लिए आने वाली राशि का उपयोग पूरी पारदर्शिता से होना चाहिए। किसी भी पदाधिकारी अथवा उसके नजदीकी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाने की आशंका होने पर निष्पक्ष जांच जरूरी है।

*’विष्णु सरकार की छवि धूमिल करने की साजिश’—क्या यह भी जांच का विषय?*

मामले का एक राजनीतिक एवं प्रशासनिक पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि पंचायत स्तर पर जानबूझकर ऐसी वित्तीय प्रक्रिया अपनाई गई जिससे शासन की पारदर्शी एवं जवाबदेह व्यवस्था पर सवाल खड़े हों, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि इसके पीछे केवल स्थानीय स्तर की लापरवाही थी अथवा किसी को राजनीतिक/व्यक्तिगत लाभ पहुंचाने का प्रयास।

हालांकि “विष्णु सरकार की छवि धूमिल करने की साजिश” को अभी तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। यह तभी स्थापित हो सकता है जब जांच में किसी सुनियोजित षड्यंत्र, जानबूझकर नियम उल्लंघन या राजनीतिक उद्देश्य के प्रमाण सामने आएं।

इसलिए सरकार की छवि बचाने का सबसे मजबूत रास्ता भी यही है कि मामले की निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच कराई जाए—दोषी मिले तो कार्रवाई हो और निर्दोष मिले तो उन्हें भी स्पष्ट रूप से क्लीन चिट दी जाए।

*”जिला पंचायत सीईओ बोले—जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई”*

मामले को लेकर जिला पंचायत गरियाबंद के सीईओ प्रखर चंद्राकर ने गंभीरता से लेते हुए कहा है कि यदि बिल के माध्यम से किसी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुंचाने का प्रयास हुआ है तो जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

सीईओ के इस रुख के बाद अब निगाहें विभागीय जांच पर टिकी हैं। ग्रामीणों की अपेक्षा है कि जांच केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि रिकॉर्ड के साथ मौके का भौतिक सत्यापन और बैंक लेन-देन का मिलान भी कराया जाए।

*जांच के सामने सबसे बड़े 10 सवाल—?*

1. उपसरपंच के नाम पर कुल कितनी राशि का बिल काटा गया?
2. बिल किस योजना/मद से संबंधित है?
3. भुगतान हो चुका है या नहीं?
4. भुगतान हुआ तो किस खाते में राशि गई?
5. क्या पंचायत की बैठक में इसका प्रस्ताव पारित हुआ था?
6. क्या कार्य वास्तव में मौके पर हुआ है?
7. सामग्री खरीदी गई तो उसका स्टॉक एवं उपयोग प्रमाण कहां है?
8. तकनीकी अधिकारी/इंजीनियर द्वारा कोई माप या प्रमाणन किया गया था या नहीं?
9. बिल बनाने से लेकर भुगतान तक किन-किन लोगों ने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए?
10. यदि पंचायत को आर्थिक नुकसान हुआ है तो धारा 89 के तहत जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

*”अब जांच से खुलेगा लाखों के बिल का राज”*

ग्राम पंचायत खोखमा का यह मामला फिलहाल आरोप, दस्तावेजों और कथित स्वीकारोक्ति के बीच खड़ा है। वास्तविकता क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन मामला इतना गंभीर जरूर है कि इसमें उपसरपंच की भूमिका, पंचायत सचिव की कार्यप्रणाली, भुगतान प्रक्रिया, संबंधित तकनीकी अमले की भूमिका और उच्च स्तर की निगरानी—सभी पहलुओं की जांच जरूरी हो गई है।

सरकारी धन जनता का धन है। इसलिए जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति या पदाधिकारी को निशाना बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि एक-एक रुपये का हिसाब सामने आए, दोषी पर कार्रवाई हो और शासन की पारदर्शी व्यवस्था पर जनता का विश्वास कायम रहे।

 

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