महर्षि वाल्मीकि जिन्होंने श्रीराम को घर घर तक पहुंचाया, शरद पूर्णिमा को महर्षि वाल्मिकी की जयंती मनाई जाती है।
रामायण को घर घर तक पहुँचाने में महर्षि वाल्मीकि का सबसे पहला योगदान रहा

AINS DESK…वैसे तो हम सब जानते है कि रामायण को घर घर तक पहुँचाने में महर्षि वाल्मीकि का सबसे पहला योगदान रहा है।
प्रचलित कथा भी सभी को पता है कि कैसे रत्नाकर नाम का डाकू लूटपाट कर अपने परिवार का भरण पोषण करता था। अचानक एक दिन नारद मुनि रत्नाकर के चपेट में आ गए। अब नारद मुनि के पास उनकी वीणा के अलावा कुछ नही मिला तो रत्नाकार को नारद पर दया भी आयी।
मौका ताड़ते हुए नारद ने रत्नाकर से उसके पाप से भरे पेशे के बारे में पूछा। तो रत्नाकर ने कहा यह पाप मैं अपने परिवार के लिए करता हूँ। नारद ने कहा कि जरा पूछ आते कौन कौन तुम्हारे इस पाप का भागीदार बनाना चाहेंगे?
रत्नाकर घर गए सबसे पूछा कोई उनके पाप का भागीदार बनाने तैयार नही हुआ। थक हार वे नारद के पास पहुंचे और पाप से उन्मोचन का उपाय पूछा नारद जी ने उन्हें राम राम जपने की सलाह दी।
रत्नाकर राम राम की जगह मरा मरा जपने लगा। तपस्या में इस कदर खो गया कि दीमकों ने उसपर मिट्टी से अपना घर (बाम्बी) बना ली।
लेकिन तपस्या से प्रभू श्रीराम प्रसन्न हुए और उन्होंने रत्नाकर को आकर आशीर्वाद दिया और चूंकि उन पर दीमक ने अपना घर बना लिया था इसलिए नाम दिया वाल्मीकि।

श्रीराम ने वाल्मीकि को दिव्य दृष्टि का आशीर्वाद दिया जिससे श्री राम के जीवन काल की सारी घटनाएं उन्हें नज़र आने लगी और उन्होंने महाकाव्य रामायण की रचना कर डाली।
बाद में श्री राम के जीवन के उत्तरार्द्ध में श्री राम की लीला से ही वाल्मिकी आश्रम में सीता माई को पनाह मिली जहां लव और कुश का जन्म हुआ। जहां उन्होंने लव कुश को श्री रामचन्द्र जी के जीवन चरित्र का ज्ञान कराया।
यह वाल्मीकि जी की जीवन यात्रा हर इंसान के लिए प्रेरणादायक है। कारण वाल्मीकि ने अपने एक ही जीवनकाल मे अपने पापकर्मो का उन्मोचन कर अपने मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
भगवान दत्तात्रय के प्रथम अवतार श्रीपाद श्री वल्लभ थे। उनके जीवन के कथा श्रीपाद श्री वल्लभ चरितामृत में इस बात का उल्लेख विशेष रूप से किया गया है कि प्रयेक आत्मा की एक जाति होती है वह उसी में जन्म लेता है।
पर उसके कर्मो के अनुसार उसकी जाति आध्यात्मिक रूप से बदलते जाती है जिसका उसे पता भी नही चलता। जब सतगुरु से अनुग्रह मिल जाता है तो गुरुमंत्र के जाप से धीरे धीरे उसके पाप कटने लगते है और साधना में दम ह्यो तो उसी जीवन मे इष्ट के दर्शन और मोक्षप्राप्ति का मार्ग खुल जाता है।
नारद जी का गुरुमंत्र डाकू रत्नाकर को मिला ।
उस दो अक्षर के गुरुमंत्र के सहारे वाल्मीकि ने ना सिर्फ अपने पूर्व पाप कर्मों का क्षय किया बल्कि अपने जीवन काल मे अपने इष्ट का दर्शन कर अपने मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया।
आज वाल्मीकि जयंती पर महर्षि वाल्मीकि की कथा हमे यही संदेश देती है। आप सभी को वाल्मीकि जयंती पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। – Ranjeet Bhonsle




