सिस्टर वंदना और सिस्टर प्रीति नामक दो नन गिरफ़्तार, तीन महिलाओं को काम दिलाने के लिए ले जा रही थीं आगरा
बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने रेलवे स्टेशन पर उन्हें रोका और पुलिस के हवाले कर दिया

AINS NEWS… दुर्ग रेलवे पुलिस ने सिस्टर वंदना और सिस्टर प्रीति नामक दो ननों को गिरफ़्तार किया। ये दोनों ननें ग्रीन गार्डन्स नामक एक धार्मिक समुदाय से जुड़ी हुई हैं। पुलिस के मुताबिक, इन पर आरोप है कि ये तीन महिलाओं को आगरा स्थित फ़ातिमा अस्पताल में काम दिलाने के लिए ले जा रही थीं, और ऐसा करके ये मानव तस्करी जैसे अपराध में शामिल थीं।

गिरफ़्तारी के बाद, सीरो-मालबार चर्च खुलकर इन ननों के समर्थन में उतर आया है। चर्च ने इस गिरफ़्तारी की कड़ी निंदा की है और इसे अल्पसंख्यकों पर हमला बताया है। उनका कहना है कि ननों के पास उन महिलाओं से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज़ मौजूद थे जिन्हें वे अपने साथ ले जा रही थीं। बावजूद इसके, बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने रेलवे स्टेशन पर उन्हें रोका और पुलिस के हवाले कर दिया।
चर्च का यह भी कहना है कि गिरफ़्तार की गईं ननों का कुष्ठ उन्मूलन और मरीजों की देखभाल के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान रहा है। ऐसे में, उन पर इस तरह के झूठे आरोप लगाना और उन्हें गिरफ़्तार करना पूर्वाग्रह से ग्रसित दिखाई देता है।
इस घटना पर सिर्फ़ चर्च ही नहीं, बल्कि कई सियासी दलों के नेताओं ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने इस घटना को लेकर भाजपा शासित राज्यों पर निशाना साधा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दुर्ग में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं द्वारा दो कैथोलिक ननों पर हमला सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान से ऐसे घृणा अपराधों के लिए मौन समर्थन की ओर इशारा करता है।
केरल में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन ने भी इस गिरफ़्तारी की निंदा की है। उन्होंने इसे पुलिस का उत्पीड़न और भीड़ का ट्रायल बताया है। उन्होंने ननों को तुरंत रिहा करने की मांग करते हुए संघ परिवार पर पाखंड का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि संघ परिवार केरल में तो दोस्ताना संबंध दिखाता है, लेकिन अन्य जगहों पर ईसाइयों को सताता है।
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) भी इस मामले में सक्रिय हो गई है। सीबीसीआई ने इन ननों को तुरंत रिहा करने की मांग की है और इसके लिए कोर्ट में याचिका दायर करने की बात कही है। सीबीसीआई के प्रवक्ता फादर रॉबिन्सन रोड्रिग्ज ने कहा कि ननों को राष्ट्र विरोधी तत्वों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है और वे इस मामले को प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सामने भी उठाएंगे।
सीबीसीआई काउंसिल फॉर वीमेन की सचिव सिस्टर आशा पॉल ने तो यह भी आरोप लगाया है कि ननों के साथ जो महिलाएँ थीं, उन्हें बयान बदलने के लिए मजबूर किया गया।
इस पूरे मामले में चर्च ने एक और गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि देश में सांप्रदायिक माहौल इतना ख़राब हो गया है कि अब ननें अपनी धार्मिक पोशाक में यात्रा करने से भी डरती हैं। चर्च ने क़ानून और संविधान से ऊपर काम करने वाली भीड़ पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई में यह मामला अल्पसंख्यक उत्पीड़न का है? चर्च और विपक्षी दलों के नेताओं के बयान तो इसी ओर इशारा करते हैं। उनका कहना है कि बिना पर्याप्त सबूतों के, सिर्फ़ बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के दबाव में आकर ननों को गिरफ़्तार करना और उन्हें परेशान करना साफ़ तौर पर अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना है।
वहीं, पुलिस का कहना है कि गिरफ़्तारी क़ानूनी प्रक्रिया के तहत हुई है और वे आरोपों की जाँच कर रहे हैं। सच्चाई क्या है, यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा। लेकिन इस घटना ने निश्चित रूप से देश में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।
अब देखना यह है कि इस मामले में आगे क्या होता है। क्या पुलिस अपनी जाँच में ननों को निर्दोष पाती है? क्या सीबीसीआई की याचिका पर कोर्ट कोई फ़ैसला सुनाता है? और क्या सरकार इस पूरे मामले पर कोई हस्तक्षेप करती है? इन सभी सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलने की उम्मीद है।




