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सरेंडर नक्सलियों ने किया काम छत्तीसगढ़ी फिल्म माटी में, नक्सली जीवन की अनकही सच्चाई

निर्माता संपत झा ने कहा, हम चाहते हैं कि लोग बस्तर को बंदूक और हिंसा से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, प्रेम और ‘माटी’ से पहचानें

AINS NEWS… छत्तीसगढ़ी फिल्म माटी इन दिनों चर्चा के केंद्र में है. इस फिल्म में बस्तर की मिट्टी, वहां के लोगों की भावनाओं और नक्सली जीवन की अनकही सच्चाई को परदे पर दिखाया गया है. फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. इस फिल्म के सब्जेक्ट और वास्तविक किरदारों के कारण दर्शकों में गहरी उत्सुकता है.

माटी फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें अभिनय करने वाले प्रमुख किरदार कोई पेशेवर कलाकार नहीं, बल्कि आत्मसमर्पण कर चुके असली नक्सली हैं. नक्सल आंदोलन की पृष्ठभूमि में प्रेम और मानवता की कहानी को दिखाने वाली यह फिल्म एक संवेदनशील प्रयोग के रूप में देखी जा रही है.

माटी फिल्म ने निर्माता निर्देशक ने बताया कि यह कहानी बस्तर के गहरे जंगलों में पनपे प्रेम और संघर्ष की है. बंदूक और लाल सलाम के बीच इंसानियत और प्रेम की एक छोटी सी लौ जलती है, यही इस फिल्म की आत्मा है. कहानी यह संदेश देती है कि कोई भी संघर्ष सिर्फ हिंसा से नहीं जीता जा सकता, बल्कि प्रेम और विश्वास ही वास्तविक परिवर्तन के सूत्रधार हैं. फिल्म में नक्सली जीवन की कठोर वास्तविकता, सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष को मानवीय दृष्टि से दिखाया गया है.

फिल्म की पूरी शूटिंग बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में की गई है. जंगलों, घाटियों, झरनों और गांवों की प्राकृतिक सुंदरता को कैमरे में बेहद संवेदनशीलता से उतारा गया है. फिल्म के निर्माता संपत झा बताते हैं “हमारा उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि बस्तर की असली छवि को लोगों तक पहुंचाना है. फिल्म में 1000 से ज्यादा बस्तर के स्थानीय लोगों ने काम किया है, जो वहीं के बाशिंदे हैं. शुरुआत में कई लोग डर के कारण शूटिंग छोड़ गए, क्योंकि नक्सलियों का खौफ अब भी उनके मन में था. लेकिन धीरे धीरे भरोसा बढ़ा और सभी ने इसे अपना प्रोजेक्ट मान लिया.”

फिल्म के हीरो महेन्द्र ठाकुर फिल्म में भीमा का किरदार निभा रहे हैं. वे कहते हैं कि बस्तर पर पहले भी कई फिल्में बनीं. लेकिन माटी फिल्म केवल नक्सलवाद की कहानी नहीं, बल्कि यह प्रेम और बदलाव की कहानी है. फिल्म यह संदेश देती है कि हिंसा से कोई जीत संभव नहीं, लेकिन प्रेम और संवाद के जरिए रास्ता जरूर निकल सकता है. हमने कोशिश की है कि दर्शक इसे केवल मनोरंजन के रूप में नहीं, बल्कि एक संदेश के रूप में देखें.

फिल्म माटी की हीरोइन भूमिका ने शूटिंग के दौरान अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें शुरुआत में यह अंदाजा नहीं था कि फिल्म में नक्सलियों के साथ काम करना पड़ेगा. भूमिका ने बताया कि जब उन्होंने पहली बार असली पूर्व नक्सलियों को अपने साथ देखा तो वह चौंक गईं. उनका कहना था कि अगर पहले से बताया जाता कि फिल्म में नक्सलियों के साथ अभिनय करना है, तो शायद वह यह फिल्म साइन नहीं करतीं. हालांकि, भूमिका ने यह भी कहा कि इस फिल्म में बस्तर की खूबसूरती, वहां के लोगों की जीवनशैली, ग्रामीण परिवेश और आदिवासी संस्कृति को बेहद संवेदनशील और कलात्मक तरीके से कहानी में पिरोया गया है.

निर्माता निर्देशक ने बताया कि माटी सिर्फ बस्तर की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक संदेश है कि इंसानियत हर विचारधारा से ऊपर है. यह फिल्म बस्तर की खूबसूरती, वहां की सामाजिक जटिलताओं और उस मिट्टी की खुशबू को सिनेमा के जरिए आम दर्शकों तक पहुंचाती है. निर्माता संपत झा ने कहा, “हम चाहते हैं कि लोग बस्तर को बंदूक और हिंसा से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, प्रेम और ‘माटी’ से पहचानें.”

 

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