कवर्धा

अधिकारियों के लिए कमाई का जरिया बना महुआ, कानून के नाम पर वसूली का कारोबार

गांव वालों का आरोप है कि घरों में घुसकर महिलाओं और बुजुर्गों तक को डराया-धमकाया जाता है

AINS NEWS… इन दिनों एक ही चर्चा है आखिर आबकारी विभाग के कुछ सब इंस्पेक्टर कानून का पालन करवा रहे हैं या फिर कानून के नाम पर वसूली का कारोबार चला रहे हैं, लोगों का आरोप है कि ये तीनों सब इंस्पेक्टर कार्रवाई के नाम पर गांव-गांव पहुंचते हैं छापेमारी करते हैं, डर का माहौल बनाते हैं और फिर शुरू होता है सेटिंग का खेल। यदि लेन-देन हो गया तो मामला शांत, लेकिन यदि कोई गरीब, किसान या आदिवासी पैसा देने में सक्षम नहीं हुआ तो उसके खिलाफ सीधे गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर जेल भेजने की तैयारी शुरू हो जाती है।

सबसे ज्यादा नाराजगी आदिवासी क्षेत्रों में दिखाई दे रही है। ग्रामीणों का कहना है कि महुआ उनके जीवन, संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। वर्षों से लोग अपने उपयोग के लिए महुआ से पेय बनाते रहे हैं। लेकिन कुछ अधिकारियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया है। गांव वालों का आरोप है कि घरों में घुसकर महिलाओं और बुजुर्गों तक को डराया-धमकाया जाता है। पैसा मिल गया तो सब ठीक, नहीं तो मामला दर्ज।

चर्चा यह भी है कि राज्य सरकार की आबकारी नीति का उद्देश्य गरीब और आदिवासी परिवारों को प्रताड़ित करना नहीं है। सरकार ने कहीं नहीं कहा कि परंपरागत जीवन जी रहे लोगों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाए। लेकिन कुछ अधिकारी अपनी कार्यशैली से पूरी सरकार की छवि खराब करने में लगे हुए हैं।

लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर कार्रवाई का पैमाना क्या है क्या कानून केवल गरीबों और आदिवासियों के लिए है बड़े शराब माफियाओं पर कार्रवाई कम और गांव के कमजोर लोगों पर दबाव ज्यादा क्यों दिखाई देता है
चाय की चुस्कियों के बीच चर्चा गर्म है कि यदि आबकारी विभाग का काम कानून लागू करना है तो वह निष्पक्ष होना चाहिए, लेकिन यदि कार्रवाई के पीछे उद्देश्य वसूली बन जाए तो फिर जनता का भरोसा टूटना तय है।
अब देखना यह है कि विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इन शिकायतों को गंभीरता से लेते हैं या नहीं। क्योंकि जनता कह रही है “कानून का डर ठीक है, लेकिन कानून के नाम पर डराकर वसूली करना बिल्कुल ठीक नहीं है।”

 

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