गरियाबंद

हाथियों के पदचिह्नों से वन पुनर्जीवन तक: उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व की अनोखी ‘एलीफेंट रेस्टोरेंट’ पहल

हाथियों के गोबर को प्राकृतिक बीज बैंक के रूप में उपयोग करके जंगलों में स्वाभाविक रूप से पौधों का संवर्धन

AINS NEWS/जीवन एस साहू/गरियाबंद… उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) ने वन्यजीव संरक्षण में एक अनूठी और नवाचारी पहल शुरू की है। रिजर्व प्रशासन ने AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित हाथी ट्रैकिंग कार्यक्रम को पारिस्थितिक पुनर्स्थापना (Ecological Restoration) में बदल दिया है। हाथियों के गोबर को प्राकृतिक बीज बैंक के रूप में उपयोग करके जंगलों में स्वाभाविक रूप से पौधों का संवर्धन किया जा रहा है।
इस पहल को “एलीफेंट रेस्टोरेंट” और “हॉर्नबिल रेस्टोरेंट” नाम दिया गया है।

हाथियों के गोबर से बन रहे ‘रेस्टोरेंट’
रिजर्व में 40 से अधिक जंगली हाथियों की निगरानी के लिए स्थानीय ग्रामीणों को एलीफेंट ट्रैकर्स के रूप में नियुक्त किया गया है। ये ट्रैकर्स CGI Elephant Tracking & Alert ऐप के जरिए रियल-टाइम लोकेशन दर्ज करते हैं, जिससे मानव-हाथी संघर्ष में काफी कमी आई है।

ट्रैकर्स हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्गों (Elephant Corridors) पर ताजा गोबर इकट्ठा करते हैं। हाथी विभिन्न फलों का सेवन करते हैं, इसलिए उनके गोबर में मौजूद बीज प्राकृतिक रूप से अंकुरित होने की अच्छी स्थिति में होते हैं। मैदानी निरीक्षण में गोबर से आम, कुम्ही और केरमेट्टा के पौधे स्वाभाविक रूप से उगते पाए गए हैं। इन पौधों को सुरक्षित स्थानों पर प्रतिरोपित करके “एलीफेंट रेस्टोरेंट” विकसित किए जा रहे हैं, जहां भविष्य में हाथियों को उनका पसंदीदा प्राकृतिक भोजन उपलब्ध रहेगा।

इसी तरह हॉर्नबिल रेस्टोरेंट के लिए स्थानीय हॉर्नबिल ट्रैकर्स पिछले तीन महीनों से केरमेट्टा, पाकड़, पीपल, बरगद और जंगली जामुन के बीज इकट्ठा कर रहे हैं। इनका रोपण उपयुक्त वन क्षेत्रों में किया जा रहा है, जिससे न केवल हॉर्नबिल बल्कि अन्य फलाहारी पक्षी और वन्यजीव भी लाभान्वित होंगे।

AI और स्थानीय ज्ञान का अनोखा मेल
यह पहल किसी अनुमान पर आधारित नहीं है। CGI Elephant Tracking & Alert ऐप से प्राप्त डेटा और हॉर्नबिल ट्रैकर्स की सूचनाओं के आधार पर उन क्षेत्रों की पहचान की जा रही है जहां वन पुनर्स्थापना का सबसे अधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर कार्यालय के अनुसार, “प्रत्येक हाथी अपने पीछे केवल पदचिह्न ही नहीं छोड़ता, बल्कि आने वाले कल के जंगलों के बीज भी छोड़ जाता है।” AI ट्रैकिंग से यह भी पता चला है कि छत्तीसगढ़ के हाथी केवल महुआ पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि तेंदू की पत्तियां-जड़ें, बांस की कोपलें, साल और अन्य अनेक वनस्पतियों का भी सेवन करते हैं।

मानव-हाथी संघर्ष में कमी और समुदाय की भागीदारी
इस पहल का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक तरीके से मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है। जब जंगलों में हाथियों का पसंदीदा भोजन उपलब्ध होगा, तो वे कृषि क्षेत्रों और गांवों की ओर कम आएंगे।
स्थानीय ग्रामीण, जो पहले हाथियों की आवाजाही से प्रभावित होते थे, अब एलीफेंट ट्रैकर्स, जैव विविधता संरक्षक, बीज संग्राहक और आवास पुनर्स्थापक के रूप में काम कर रहे हैं। यह सामुदायिक सहभागिता आधारित संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है।

पर्यावरण और जलवायु के लिए मील का पत्थर
यह पहल उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व को जलवायु-अनुकूल और आत्मनिर्भर वन पारिस्थितिकी तंत्र बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताई जा रही है। हाथियों को “जंगलों का माली” कहा जाता है, क्योंकि वे लंबी दूरी तक बीजों का प्रसार करते हैं। इस पहल से पारिस्थितिक कनेक्टिविटी, जैव विविधता और दीर्घकालिक जलवायु सहनशीलता मजबूत होगी।
यह भारत में संभवतः पहली ऐसी पहल है, जिसमें AI, फील्ड डेटा और प्राकृतिक बीज प्रसार को एकीकृत करके वैज्ञानिक आधार पर हाथियों के आवास का समृद्धिकरण और मानव-हाथी संघर्ष न्यूनीकरण किया जा रहा है।

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