पीएम जनमन सड़क के नाम पर आदिवासियों को ठगने का आरोप, गुणवत्ता और मूल्यांकन पर उठे गंभीर सवाल
पहुंच मार्ग के नाम पर घटिया निर्माण, कहीं उखड़ रहा डामर तो कहीं गिट्टी बिछाकर छोड़ दिया काम

AINS NEWS/जीवन एस साहू/गरियाबंद… आदिवासी बाहुल्य गरियाबंद जिले में प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत विशेष रूप से आदिवासी बाहुल्य एवं दूरस्थ गांवों को मुख्य मार्गों से जोड़ने के लिए बनाए जा रहे पहुंच मार्गों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि आदिवासियों को बेहतर सड़क सुविधा देने के नाम पर निर्माण कार्यों में जमकर लापरवाही बरती जा रही है। स्थिति यह है कि जिन सड़कों पर वाहनों का दबाव तक नहीं है,वे निर्माण के कुछ ही समय बाद उखड़ने लगी हैं।

जंगल और पहाड़ी इलाकों में मुख्य सड़क से गांवों को जोड़ने के लिए बनाई जा रही इन सड़कों का उद्देश्य दूरस्थ आदिवासी बस्तियों तक आवागमन की सुविधा पहुंचाना है।लेकिन निर्माण में गुणवत्ता की अनदेखी के चलते यह उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ गया है।ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण में निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं किया जा रहा है और कई स्थानों पर बेहद पतली डामर की परत बिछाकर सड़क तैयार कर दी गई है।

एक-दो इंच की डामर परत,बैलगाड़ी के पहिए से उखड़ने लगी सड़क
ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही शिकायतों के अनुसार कई पहुंच मार्गों पर डामर की परत इतनी पतली बिछाई गई है कि सामान्य आवागमन में ही सड़क की ऊपरी परत उखड़ने लगी है। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ स्थानों पर बैलगाड़ी के पहिए चलने से ही डामर उखड़कर गिट्टी बाहर आने लगी है। ऐसे में बारिश और लगातार आवागमन के बाद इन सड़कों की स्थिति क्या होगी,इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
वही दूरस्थ गांवों में सड़क निर्माण की स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है। कई जगह सड़क पर केवल गिट्टी बिछाकर काम अधूरा छोड़ दिए गया है। वहीं जिन स्थानों पर डामरीकरण किया गया है,वहां भी गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कागजों में सड़क का निर्माण पूरा दिखाकर मूल्यांकन और भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है, जबकि मौके पर सड़क की वास्तविक स्थिति अलग नजर आती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन सड़कों पर भारी वाहनों की आवाजाही तक नहीं होती। अधिकांश सड़कें गांवों और मुख्य मार्गों को जोड़ने वाले छोटे पहुंच मार्ग हैं। इसके बावजूद निर्माण के कुछ ही दिनों या शुरुआती बारिश में सड़क की परत उखड़ने लगे तो निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण में निर्धारित मोटाई,सामग्री और तकनीकी मापदंडों का पालन किया गया होता तो इतनी जल्दी सड़क खराब नहीं होती।
आदिवासियों के लिए बनी योजना, लेकिन फायदा किसे?
प्रधानमंत्री जनमन योजना का उद्देश्य विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों और दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना है।सड़क जैसी मूलभूत सुविधा आदिवासी गांवों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।बारिश के मौसम में सड़क खराब होने का सीधा असर ग्रामीणों की आवाजाही,मरीजों को अस्पताल पहुंचाने,बच्चों की पढ़ाई और कृषि उपज को बाजार तक ले जाने पर पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि योजना के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गुणवत्ताहीन सड़कें बनेंगी और कुछ ही समय में उखड़ जाएंगी तो इसका खामियाजा आखिरकार आदिवासी ग्रामीणों को ही भुगतना पड़ेगा।
गुणवत्ता जांच और थर्ड पार्टी निरीक्षण की उठी मांग
ग्रामीणों ने संबंधित विभाग के अधिकारियों से मांग की है कि प्रधानमंत्री जनमन योजना के तहत जिले में बनाए गए सभी पहुंच मार्गों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए। सड़क की लंबाई,चौड़ाई,डामर की मोटाई,इस्तेमाल की गई सामग्री,निर्माण की लागत और मौके पर हुए वास्तविक कार्य का भौतिक सत्यापन कराया जाए। साथ ही जिन सड़कों का मूल्यांकन हो चुका है, उनके भुगतान और निर्माण गुणवत्ता की भी जांच की जाए।यदि जांच में निर्माण एजेंसी या संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई की मांग भी ग्रामीणों ने की है।
सवाल यह है कि आदिवासी क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बनाई जा रही सड़कें यदि कुछ ही दिनों में उखड़ने लगेंगी, तो करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी गांवों तक विकास की पक्की राह आखिर कैसे पहुंचेगी?




