छत्तीसगढ़

मणिपुर में ध्वस्त हो चुकी राज्य की संवैधानिक व्यवस्था पर राष्ट्रपति तत्काल हस्तक्षेप करें, एन बिरेन सिंह सरकार को बर्खास्त करें

सभी समुदायों की भागीदारी के साथ कारगर शान्ति प्रक्रिया आरम्भ की जाए।

AINS NEWS…छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन सहित राज्य के विभिन्न लोकतांत्रिक नागरिक संगठन के लोगों ने आज दिनांक 21 जुलाई 2023 को अम्बेडकर चौक रायपुर में नागरिक विरोध सभा आयोजित कर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन प्रेषित किया l मणिपुर में विगत दो माह से अनवरत ज़ारी जातीय और सांप्रदायिक हिंसा जिसमें 150 से अधिक जानें गयी इसकी सभी ने मिलकर कड़ी भर्त्सना की । हत्या, आगजनी, बलात्कार और यौन अत्याचार करने वालों के खिलाफ सख्त करवाई करते हुए राज्य की एन बिरेन सिंह सरकार को बर्खास्त करने की मांग राष्ट्रपति से की गई l इसके आलावा मामले की निष्पक्ष जांच हेतु सुप्रीम कोर्ट SIT का गठन करे, सभी समुदायों की भागीदारी के साथ कारगर शान्ति प्रक्रिया आरम्भ की जाये; पीड़ित परिवारों का समग्र पुनर्वास किया जाये; और आदिवासी समुदायों और अल्प संख्यकों की सुरक्षा के संवैधानिक सिद्धांतों का पूर्ण पालन करने की मांगे ज्ञापन में की गईं l

सरकारी प्रश्रय व ढिलाई से इस हिंसा से मणिपुर के सैंकड़ों घरों व चर्चों में आगजनी हुई है, और फलस्वरूप हजाररों लोगों को विस्थापित होना पड़ा है। इस मानवीय त्रासदी के बीच, 4 मई को घटित और हाल में उजागर हुए, कूकी जनजाति की दो महिलाओं के साथ अकथनीय यौन हिंसा और सामूहिक बलात्कार की घटनाओं से पूरा देश विचलित है।
यहाँ यह तथ्य जानना जरूरी है कि, मणिपुर राज्य मे मेइतेइ जैसे प्रभावशाली बहुसंख्यक (अधिकांश अपने को हिन्दू मानने वाली) मैदानी समुदाय और पहाड़ी आदिवासी कूकी समुदाय (जिनमे बड़ी संख्या में इसाई धर्म के मानने वाले हैं); के बीच जो नफरत भड़काई गयी वह राजनैतिक रूप से प्रायोजित थी। हाई कोर्ट के फैसले से आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के छीने जाने से असुरक्षित थे। जब मेइतेइ समुदाय के कुछ हिंसक गुटों ने सैकड़ों हथियार लूटे तो पुलिस और सुरक्षा बल मूकदर्शक बनी रही। प्रदेश की भाजपा सरकार और केंद्र सरकार शांति बनाये रखने में पूरी तरह विफल रही है। मणिपुर के 115 गाँव जलाये गए, 4000 से अधिक घर तोड़े गए और 225 चर्चों को भी नहीं बख़्शा गया। आज भी 50,000 से अधिक मणिपुरी लोग करीब 350 राहत शिविरों में शरण ले रहे हैं।
जो भयानक विडियो वायरल हुआ है, वह यौन हिंसा की एकमात्र घटना नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से जनवादी आन्दोलन पूरी तरह सहमत है कि “महिलाओं पर यौन अत्याचार को हिंसा के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना एक संवैधानिक लोकतंत्र में बिलकुल स्वीकार्य नहीं हो सकता”।

हम समझते हैं कि यह सच है कि जातीय या सांप्रदायिक हिंसा हो, युद्ध हो या सुरक्षा बलों के ऑपरेशन, ताकतवर अपना वर्चस्व महिला शरीर पर यौन हिंसा करके स्थापित करते है और यह बात हमने प्रियंका भोतमंगे, बिलकिस बानो, मीना खलखो और सोनी सोडी के मामलो में देखा है और आज अपनी कूकी आदिवासी बहनों की पीड़ा में देख रहे हैं।
मणिपुर में लगभग 80 दिनों से जातीय और सांप्रदायिक हिंसा जारी है। बावजूद इसके हिंसा को रोकने और शांति बहाली करने में राज्य सरकार पूरी तरह विफल रही है। दरअसल यह एन. बिरेन सिंह का जान बूझकर किया गया प्रोग्रोम है। राज्य पुलिस बल का साम्प्रदायिकरण, बहुसंख्यक समुदायों को शस्त्रागारों से शस्त्र लूटने की सहूलियत देना, खुद मुख्यमंत्री द्वारा सैकडों ऐसी (हत्या-बलात्कार) घटनाओं की स्वीकारोक्ति तथा पिछले 77 दिनों से दर्ज 5000 से ज्यादा एफआईआर पर कोई कार्यवाही नहीं किया जाना, राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा ही है । कुकी महिलाओं पर यौन हिंसा एवं सामूहिक बलात्कार भारत के लोकतंत्र पर बलात्कार है, जो पिछले 9 साल से आरएसएस-बीजेपी द्वारा अपनी फासीवादी मंसूबे को सुनियोजित तरीके से लागू किया जा रहा है।

नागरिक प्रतिरोध सभा में सुदेश टीकम (जिला किसान संघ राजनंदगांव) कल्याण पटेल, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (मजदूर कार्यकर्त्ता समिति) संजय पराते (छत्तीसगढ़ किसान सभा) प्रवीण शयोकंद (भारतीय किसान यूनियन, टिकैत), विजेंद्र अजनबी (छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच) अखिलेश एडगर (प्रोग्रेसिव क्रिश्चियन एलायंस) सौरा यादव (सीपीआई एम्एल, रेड स्टार), एड. कुरैशी ( राष्ट्रीय मुस्लिम मोर्चा) और नरोत्तम शर्मा ( छग किसान महासभा), बृजेंद्र तिवारी (सीपीआई एमएल लिब), भीमराव बागड़े (सीएमएम), अभय कुमार (भारत मुक्ति मोर्चा), संयुक्त मोर्चा एससी एसटी ओबीसी छग, आदि शामिल हुए l

 

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