माओवादियों ने दिखाई मानवता, डीआरजी के जवान को सकुशल छोड़ा, 7 दिनों बाद जन अदालत में लिया गया फैसला
छुट्टी नहीं मिली तो इसने ड्यूटी टाइम में ही समय निकालकर अपनी प्रेमिका से मिलने चला गया, क्योंकि वह इलाका माओवादियों का था
AINS NEWS EXLUSIVE….. छत्तीसगढ़ के बस्तर के जंगलों में एक और अदालत लगाई जाती है जिसे जन अदालत कहते हैं, यहां काला कोट पहनकर कोई पैरवी नहीं करता, कोई आर्डर आर्डर कहकर चुप नहीं कराता। यहां की जन अदालत में फैसला माओवादी संगठन सुनाते है, लेकिन जन अदालत में आए ग्रामीणों से सलाह मशवरा करने के बाद। ऐसी ही एक जन अदालत अबूझमाड़ के जंगलों में लगाई गई, जहां आरोपी था छत्तीसगढ़ शासन के डीआरजी का एक जवान संतोष कोड़याम। सबसे पहले तो उसके ऊपर आरोप था कि उसने डीआरजी क्यों ज्वाइन की, क्या वह माओवाद खत्म करने की सरकार की मुहिम में साथ दे रहा था या फिर किसी और कारण से उसने डीआरजी ज्वाइन की।

सबसे पहली बात की डीआरजी का यह जवान माओवादियों के कब्जे में कैसे आया?
प्राप्त जानकारी के अनुसार यह जवान अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए छुट्टी की अर्जी लगाया था लेकिन इसे छुट्टी नहीं मिली तो इसने ड्यूटी टाइम में ही समय निकालकर अपनी प्रेमिका से मिलने चला गया, क्योंकि वह इलाका माओवादियों का था, जवान जब प्रेमिका से मिलने गया तो माओवादियों ने उसे अपहरण कर लिया, 29 सितंबर को जवान का अपहरण किया गया लगभग 7 दिनों बाद कब्जे में रखने के उपरांत उसे अबूझमाड़ के जंगलों में लगी जन अदालत में उपस्थित किया गया। इस जन अदालत में कुछ स्थानीय पत्रकारों को भी आमंत्रित किया गया। सुबह से लगी जन अदालत में शाम को यह फैसला आया कि डीआरजी के जवान को सकुशल रिहा किया जाता है लेकिन इस डीआरजी की नौकरी छोड़नी पड़ेगी।

माओवादी संगठनों के फैसले से संतुष्ट डीआरजी का यह जवान संतोष कोड़याम अपनी नौकरी छोड़ने के लिए तैयार हो गया। माओवादी संगठनों ने दलील दी कि जब तक इसने नौकरी की इसने माओवादियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि एक बंद पड़े स्कूल को चालू भी करवाया, क्योंकि यह अबूझमाड़ के जंगलों में अपनी प्रेमिका से मिलने आया था, इसका कोई और उद्देश्य नहीं था और इसने डीआरजी के जवान की नौकरी अपने परिवार के पालन पोषण के लिए की थी ना कि माओवादी संगठन को खत्म करने की मुहिम में शामिल होने के लिए।




