छत्तीसगढ़

शराब घोटाले में नए नाम के रूप में पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांढ की एंट्री, ED के 10 पन्नों के रिमांड नोट में आया नाम

अवैध तरीके अपनाकर इस गिरोह ने करीब 2000 करोड रुपए के शराब घोटाले को अंजाम दिया था

AINS NEWS… ED के कोर्ट में पेश 10 पन्नों के रिमांड नोट में शराब घोटाले में नए नाम के रूप में पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांढ की एंट्री हो गई है। यह रिमांड नोट पूर्व मंत्री और कोंटा के विधायक कवासी लखमा की गिरफ्तारी के समय कोर्ट में पेश किए गए रिमांड नोट में कही गई।रिमांड नोट के ब्रीफ फैक्ट के E कॉलम में लिखा गया है कि That the liquor Syndicate consisting or Mr Anwar Dhebar, Mr Anil tuteja and Mr Arun Pati Tripathi was working under the aegis of retried Indian administrative officer mister Vivek dhand he was also a beneficiary of the scam…

ED की जांच में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2019- 20 20- 21 और 21- 22 की अवधि में विभिन्न अवैध तरीके अपनाकर इस गिरोह ने करीब 2000 करोड रुपए के शराब घोटाले को अंजाम दिया था। पिछले साल आज के ही दिन यानी 17 जनवरी 2024 को ED ने नई ECIR में कई नामी लोगों के नामों को उजागर किया था। नकली होलोग्राम की जांच यूपी तक पहुंची थी और अनवर ढेबर सहित अन्य को यूपी पुलिस गिरफ्तार करके ले गई। तब पता चला था कि नया रायपुर में भी नकली होलोग्राम की छपाई भाजपा सरकार के आने के बाद तक होती रही जिसका कॉन्ट्रैक्ट अक्टूबर 2024 तक था लेकिन ईओडब्लू ने नया रायपुर में जून में ही छापा मार कर खुलासा कर दिया था।

ED की जांच के बाद कुछ रिटायर्ड आईएएस अधिकारियों और आबकारी विभाग के ओएसडी अरुण पति त्रिपाठी समेत तत्कालीन सचिव निरंजन दास के आवासों पर छापेमारी की गई थी ED ने इस मामले में करीब 20 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार का जेल भेजा था। कांग्रेस सरकार के समय शराब नीति में परिवर्तन कर FL-10 A जैसे नए लाइसेंस की शुरुआत की गई थी। डिस्टलरी से लेकर डिस्टलरी में सप्लाई किए जाने वाले सामानों, बोतलों, बोतलों पर लगने वाले होलोग्राम, डिस्ट्रीब्यूशन, शराब दुकानों में काम करने वाले कर्मियों, देसी विदेशी दुकानों में बिकने वाले ब्रांड से लेकर हर छोटी बड़ी चीजों और पूरे सिस्टम पर कार्टेल का कब्जा था।

शराब घोटाले के लिए A,B और C फार्मूले के तहत तीन काउंटर बनाए गए थे, नकली और असली दोनों होलोग्राम वाली शराब एक ही दुकान से बिकती थी लेकिन उसका अकाउंट अलग-अलग मेंटेन होता था। इसके अलावा आबकारी अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग भी कार्टेल से ही तय की जाती थी।

 

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