कवर्धा

कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से कान पकड़वाकर माफी मंगवाई कलेक्टर ने, कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया

पूरी घटना का वीडियो किसी ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया

AINS NEWS… 4 जुलाई 2025 की सुबह, कलेक्टर गोपाल वर्मा रोज़ की तरह अपने दफ्तर पहुंचे। कलेक्टर साहब ने देखा कि कई कर्मचारी अभी तक दफ्तर नहीं पहुंचे हैं, जबकि समय हो चुका है। कलेक्टर को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने तुरंत ऑफिस के मुख्य गेट पर एक कुर्सी मंगवाई और खुद वहीं बैठ गए। जैसे ही देर से आने वाले कर्मचारी गेट पर पहुंचे, कलेक्टर ने उन्हें वहीं रोक लिया।

फिर जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। कलेक्टर ने सभी देर से आए कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से कान पकड़वाकर माफी मंगवाई। कुल 42 कर्मचारियों को देर से आने पर चिह्नित किया गया और उन्हें कारण बताओ नोटिस भी थमा दिया गया।
कलेक्टर साहब ने साफ कहा, “यह पहली गलती है, इसलिए चेतावनी दी जा रही है। अगली बार और सख्त कार्रवाई होगी।”

इस पूरी घटना का वीडियो किसी ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया। कुछ ही घंटों में ये वीडियो वायरल हो गया। लोगों के बीच बहस छिड़ गई, क्या कलेक्टर का तरीका सही है? क्या सरकारी कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से इस तरह सजा देना ठीक है?

जैसे ही ये वीडियो वायरल हुआ, जिले भर के सरकारी कर्मचारी भड़क उठे। कर्मचारी संगठनों ने इसे कर्मचारियों की गरिमा का अपमान बताया। उनका कहना है कि कलेक्टर को शारीरिक दंड देने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने राज्य सरकार से कलेक्टर के तत्काल निलंबन और विभागीय जांच की मांग की है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि इस तरह की सार्वजनिक सजा से कर्मचारियों का मनोबल गिरता है और कार्यस्थल का माहौल खराब होता है।

कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने कलेक्टर की कार्रवाई को ‘तालिबानी मानसिकता’ करार दिया है। उन्होंने सरकार से सवाल किया है कि कलेक्टर को शारीरिक दंड देने का अधिकार किसने दिया? कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा, “यह लोकतंत्र है, तालिबान नहीं।
कलेक्टर को अधिकार नहीं कि वह कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करे। हम सरकार से मांग करते हैं कि कलेक्टर को तुरंत निलंबित किया जाए और विभागीय जांच हो।”

वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि सरकारी दफ्तरों में अनुशासन जरूरी है, लेकिन उसका तरीका मानवीय होना चाहिए।
राजनीतिक दलों के बीच भी इस मुद्दे पर मतभेद हैं, कुछ लोग कलेक्टर के सख्त रवैये के पक्ष में हैं, तो कुछ कर्मचारी संगठनों के साथ।

कलेक्टर साहब ने अपनी सफाई में कहा है कि उन्होंने यह कदम अनुशासन के लिए उठाया। उनका कहना है कि सरकारी दफ्तरों में समय की पाबंदी जरूरी है और यह पहली गलती थी, इसलिए चेतावनी दी गई है। उन्होंने आगे कहा कि अगली बार और सख्त कार्रवाई की जाएगी। कलेक्टर ने यह भी कहा कि सरकारी दफ्तरों में जनता को समय पर सेवा मिलना चाहिए। अगर कर्मचारी समय पर नहीं आएंगे तो जनता को परेशानी होगी, इसलिए अनुशासन जरूरी है।

प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकारी दफ्तरों में अनुशासन जरूरी है, लेकिन उसका तरीका मानवीय होना चाहिए।
अगर कर्मचारियों के साथ कड़ा व्यवहार किया जाएगा, तो वे डर के माहौल में काम करेंगे, जिससे उनकी कार्यक्षमता घटेगी।
वहीं, अगर अनुशासन नहीं होगा, तो जनता को परेशानी होगी। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन और कर्मचारी दोनों मिलकर काम करें, ताकि जनता को बेहतर सेवा मिल सके और कर्मचारियों का सम्मान भी बना रहे।

 

 

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