बैगा जनजाति के बच्चों की खरीद फरोख्त का खुलासा, 13 बच्चों का रेस्क्यू, 8 गिरफ्तार
गरीबी के चलते माँ बाप कर रहे हैं अपने ही बच्चों का सौदा

AINS NEWS… कवर्धा से एक बड़ी खबर सामने आई है, जो निश्चित रूप से सरकार और समाज के ऊपर सवालिया निशान खड़े कर रही है। पूरा मामला है छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का जहां मानवता को शर्मसार कर देने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां नाबालिग बच्चों को महज 5 से 6 हजार रुपए में बेचने का खुलासा हुआ है। गरीबी में जीवन यापन कर रहे बैगा आदिवासी की हालत कुछ इस कदर खराब है कि दो वक्त की रोटी भी मुहैया नहीं हो रही है यह अलग बात है कि सरकार उनके नाम पर करोड़ों रुपए खर्च करने का दावा करती है।

हैरानी वाली बात यह है कि इन बच्चों के मां-बाप ही इन्हें महज दो से तीन हजार रुपए के लिए लोगों के यहां मजदूरी करने के लिए भेज देते हैं, वहां पर इसे जी तोड़ मेहनत करवाई जाती है और एवज में मिलते है चंद रुपए
दरअसल पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि कुछ लोगों द्वारा नाबालिग बच्चों को बाहर ले जाकर उनसे मजदूरी कराई जा रही है। सूचना मिलते ही कवर्धा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। इस दौरान पुलिस ने दूर दराज के इलाकों से 13 नाबालिग बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू किया। वहीं 8 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया गया। बताया जा रहा है कि इन बच्चों से जबरन मजदूरी कराई जा रही थी और उन्हें बेहद कम कीमत पर खरीदा गया था।
मामले से जुड़े एक लिखित आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि चेतन यादव और रवि यादव नामक व्यक्तियों द्वारा नाबालिग बैगा बच्चों की खरीद-फरोख्त की गई। आवेदन में यह भी उल्लेख है कि बच्चों को गांव से दूर ले जाकर काम में लगाया गया और उनके बदले माता-पिता को पैसे दिए गए।
पुलिस को बच्चों ने बताया कि उनसे सुबह 6 बजे से रात 7 बजे तक खेतों की रखवाली और मवेशी चराने का काम कराया जाता था। विश्राम नाममात्र का मिलता था। मेहनत के बदले बच्चों को कोई मजदूरी नहीं दी जाती थी। सारा पैसा बिचौलिए डकार जाते थे या माता-पिता को 1000-2000 रुपए थमा दिए जाते थे। एसपी ने बताया कि अभी और बच्चों की सर्चिंग की जाएगी। इन बच्चों के परिजनों के बातचीत से पता चलता है कि बैगा आदिवासी काफी गरीबी में गुजारा कर रहे हैं। इन्होंने बच्चों को दलाल के सुपुर्द करने की बात स्वीकार की।
इन बैगा परिवारों की गरीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये बच्चे अपने घर वापस नहीं जाना चाहते। इनका कहना है कि जहां वे काम कर रहे थे वहां घर से अच्छा खाना मिलता था। बाल कल्याण समिति द्वारा की गई काउंसलिंग में इस बात का भी खुलासा हुआ कि सारे बच्चे अनपढ़ हैं और इन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। राष्ट्रपति के दत्तक बैगा जनजाति के लिए जिले में चलाई जाने वाली योजनाएं जमीन पर किस तरह दम तोड़ रही हैं इसका अंदाजा इस खबर से लगाया जा सकता है।




