मनोरंजन

सिंगल स्क्रीन सिनेमा के पुनरुत्थान की नई पहल, चलो पिक्चर चले

बेहतर प्रबंधन, उन्नत तकनीक, स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा और दर्शकों के लिए आकर्षक अनुभव प्रदान कर सिंगल स्क्रीन थिएटर्स को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया जा सकता है

AINS NEWS…. सिंगल स्क्रीन सिनेमाओं के सुनहरे दौर को फिर से जीवंत करने की अनोखी मुहिम “चलो पिक्चर चले” इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। जाने-माने निर्माता एवं निर्देशक अनुभव सिन्हा द्वारा शुरू की गई यह विशेष यात्रा देश के विभिन्न राज्यों के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स तक पहुँचकर वहाँ के सिनेमा मालिकों, कर्मचारियों, वितरकों और फिल्म उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों से सीधा संवाद स्थापित कर रही है। उद्देश्य स्पष्ट है—सिंगल स्क्रीन व्यवसाय को समझना, उसकी चुनौतियों को पहचानना और उसे फिर से मजबूत बनाने के रास्ते तलाशना।

इसी श्रृंखला में आज यह कारवाँ रायपुर शहर के प्रतिष्ठित एवं ऐतिहासिक राज टॉकीज पहुँचा, जहाँ छत्तीसगढ़ के सिनेमा जगत से जुड़े दिग्गजों की उपस्थिति में एक महत्वपूर्ण चर्चा सत्र आयोजित किया गया।

इस संवाद में निर्माता, निर्देशक, वितरक, टेक्नीशियन, सिनेमा मालिक और विभिन्न प्रतिनिधियों सहित बड़ी संख्या में सिनेमा कर्मियों ने हिस्सा लिया। उपस्थित प्रमुख लोगों में रितेश राठोड़, सुनील बजाज, लाभांश तिवारी, लकी रंगशाही, शांति लाल लुंकड़, अलक राय, तरुण सोनी, मनीष, तोरण सिंह राजपूत, हरीश सहगल सहित शहर एवं प्रदेश के कई अन्य सिनेमा वितरक, मालिक, कर्मचारी और प्रतिनिधि शामिल थे।

सत्र के दौरान सभी उपस्थित लोगों ने सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के बदलते दौर, आज की चुनौतियों, दर्शकों की नई पसंद, डिजिटल बदलाव, और भविष्य की संभावनाओं पर खुलकर विचार साझा किए। साथ ही इस बात पर भी चर्चा हुई कि किस प्रकार बेहतर प्रबंधन, उन्नत तकनीक, स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा और दर्शकों के लिए आकर्षक अनुभव प्रदान कर सिंगल स्क्रीन थिएटर्स को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री के निर्माता, निर्देशक, कलाकार और टेक्नीशियनों ने भी अपनी-अपनी तरफ से महत्वपूर्ण सुझाव दिए। सभी ने एक सुर में कहा कि सिंगल स्क्रीन न सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि यह शहरों की सांस्कृतिक धरोहर भी है, जिसे संरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है।

“चलो पिक्चर चले” जैसी पहल यह साबित करती है कि भारतीय सिनेमा की जड़ें अभी भी मजबूत हैं, और यदि सभी एकजुट होकर प्रयास करें तो सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का स्वर्णिम युग फिर से लौट सकता है।

 

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