नक्सलियों का शांति वार्ता का प्रस्ताव, सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं नक्सली
ये प्रेस नोट सिर्फ़ एक रणनीति है, या सचमुच बदलाव की शुरुआत?

AINS NEWS… छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका, जो कभी नक्सलियों का गढ़ कहलाता था, आज एक बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है। सुरक्षाबल दिन-रात जंगलों में घुसकर नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन चला रहे हैं। हाल ही में बीजापुर और सुकमा जैसे इलाकों में हुई मुठभेड़ों ने नक्सलियों की कमर तोड़ दी है। 2025 की शुरुआत से अब तक सैकड़ों नक्सली या तो मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। लेकिन ये सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं, ये उस डर की कहानी है जो नक्सलियों के मन में घर कर गया है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों दंतेवाड़ा में कहा था, 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सलवाद से मुक्त कर देंगे।’ और इस दावे को सच करने के लिए सरकार और सुरक्षाबल पूरी ताक़त झोंक रहे हैं।
हाल ही में नक्सलियों की उत्तर पश्चिम सब जोनल ब्यूरो के नेता ने एक प्रेस नोट जारी किया, जिसमें शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा गया। नोट में लिखा है, ‘हम सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके लिए सुरक्षाबलों की कार्रवाई रुकनी चाहिए। लेकिन, क्या ये शांति की सच्ची चाहत है, या फिर दबाव में उठाया गया क़दम? क्या ये प्रेस नोट सिर्फ़ एक रणनीति है, या सचमुच बदलाव की शुरुआत?

नक्सलियों के इस प्रस्ताव पर छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा ने कहा, ‘अगर एक भी नक्सली बातचीत के लिए तैयार है, तो हम खुले दिल से स्वागत करेंगे। हथियार छोड़ें, मुख्यधारा में आएं, हम उनके साथ खड़े रहेंगे।’
‘जो सरेंडर करेगा, उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। उनके सारे केस वापस लिए जाएंगे।’ सरकार की नई रिहैबिलेशन पॉलिसी नक्सलियों को नया जीवन देने का वादा करती है – नौकरी, सुरक्षा, और सम्मान। सरकार न सिर्फ़ नक्सलियों को खत्म करना चाहती है, बल्कि उन्हें समाज का हिस्सा बनाना भी चाहती है।
बस्तर का भविष्य क्या होगा? नक्सलियों का ये शांति प्रस्ताव और सरेंडर का सिलसिला एक नई उम्मीद तो जगाता है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सरकार और नक्सलियों के बीच विश्वास का पुल बनाना आसान नहीं होगा।
सरकार ने गाँवों को नक्सल-मुक्त बनाने के लिए 1 करोड़ रुपये की मदद का ऐलान भी किया है। लेकिन ये सपना तभी पूरा होगा, जब बस्तर की जनता खुद आगे आए।




