वन अनुमति, प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता के बीच अटका प्रोजेक्ट, लाखों खर्च के बाद भी नहीं मिला लाभ
नहरें टूट चुकी हैं, संरचनाएं जर्जर हो चुकी हैं और पूरा प्रोजेक्ट खंडहर में तब्दील होता जा रहा है

AINS NEWS जीवन एस साहू गरियाबंद… विकासखंड मैनपुर से लगभग तीन किलोमीटर दूर मैनपुरकला पंचायत के फुलझर गांव के पास स्थित सलफ जलाशय पिछले 40 वर्षों से अधूरा पड़ा है। कभी यह परियोजना गरियाबंद अंचल के किसानों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती थी, लेकिन आज भी अधूरी होने के कारण किसान पानी के लिए तरस रहे हैं।

सलफ जलाशय की परिकल्पना 1980 के दशक में अविभाजित मध्यप्रदेश शासन काल में की गई थी। योजना के तहत पहाड़ियों को जोड़कर फुलझर नाले पर बांध निर्माण प्रस्तावित था। यदि यह परियोजना पूरी हो जाती, तो मैनपुर, मैनपुरकला, गठीगढ़, हरदीभाटा, गोपालपुर, गौराट, दैहारगुड़ा और नहानबिरी सहित दर्जनों गांवों की हजारों एकड़ जमीन सिंचित हो सकती थी।
जानकारी के अनुसार, इस परियोजना का लगभग 80 प्रतिशत कार्य तीन दशक पहले ही पूरा कर लिया गया था, लेकिन अंतिम चरण में काम अचानक रुक गया। वर्तमान में नहरें टूट चुकी हैं, संरचनाएं जर्जर हो चुकी हैं और पूरा प्रोजेक्ट खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।

बताया जाता है कि इस जलाशय को वन विभाग द्वारा लगभग 4 लाख पेड़ों की कटाई का हवाला देकर रोक दिया गया था। हालांकि अब इस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई प्रस्तावित थी या यह केवल अनुमान था। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि परियोजना शुरू करने से पहले वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र लिया गया था या नहीं।
यदि वन विभाग से अनुमति ली गई थी, तो परियोजना 40 वर्षों से क्यों अटकी रही, और यदि अनुमति नहीं ली गई थी, तो इतनी बड़ी योजना बिना मंजूरी कैसे शुरू हो गई। यह पूरा मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
जल संसाधन विभाग द्वारा इस अधूरे बांध को बचाने के लिए वर्षों से लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। नहरों की सफाई और मरम्मत भी कराई गई, लेकिन परियोजना को पूरा करने की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।
लंबे समय से अधूरी पड़ी इस परियोजना की नहरों पर अब अवैध कब्जा भी होने लगा है। कई स्थानों पर निर्माण कार्य हो चुके हैं, जिससे भविष्य में परियोजना को पूरा करना और कठिन हो सकता है।
इस जलाशय के अधूरे रहने का खामियाजा किसान हर साल सूखे के रूप में भुगत रहे हैं। यदि यह परियोजना पूरी हो जाती, तो मैनपुर क्षेत्र में जल संकट काफी हद तक खत्म हो सकता था।
पिछले चार दशकों में कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस महत्वपूर्ण परियोजना को पूरा करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। सलफ जलाशय अब केवल एक अधूरी योजना नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, अधूरी पर्यावरणीय प्रक्रिया और राजनीतिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है।




